पर्वत  

पर्वत निर्माण की संकुचन परिकल्पना

पृथ्वी आदि काल में द्रव रूप में थी। अत: वर्तमान पृथ्वी का आकार इसके ठंडे होने से बना है। सर्वप्रथम पृथ्वी की ऊपरी परत ठंढी होने से ठोस हो गई, किंतु नीचे ठंडा होने की क्रिया जारी रही अत: नीचे की सतह सिकुड़ती गई, और ऊपरी परत से अलग हो गई। ऊपरी परत में गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण संकुचन उत्पन्न हुआ फलत: पर्वत निर्माणकारी पर्वतन का जन्म हुआ। इस परिकल्पना को समझने के लिए सूखे सेब का उदाहरण लिया जा सकता है। यह भी कहा जाता है कि जैसे जैसे पृथ्वी की ठंढे होने की क्रिया धीमी होती गई वैसे वैसे पर्वत निर्माणकारी क्रियाएँ भी मंद होती गई। आर्थर होम्स की संवहन धारा की परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी के गर्भ में ताप की धाराएँ ऊपर नीचे चला करती हैं। ये धाराएँ भूपटल की निम्न तह में मुड़ते समय संकुचन तथा फैलते समय फैलाव उत्पन्न कर देती हैं। अत: दो विभिन्न दिशाओं से आने वाली संवहन धाराओं के मुड़ने के स्थान पर पर्वत निर्माणकारी शक्तियों का जन्म होता है। आरगैड की परिकल्पना के अनुसार पर्वत निर्माण में दो कठोर भूखंडों में से एक अग्र प्रदेश तथा दूसरा पृष्ठ प्रदेश होता है। इसके अनुसार पर्वत निर्माणकारी संकुचन एक ओर से ही होता है, तथा इसमें अग्र प्रदेश स्थिर रहता है एवं संकुचन पृष्ठ प्रदेश से आता है। आरगैंड के अनुसार यूरोपीय पर्वतन में अफ़्रीका का पृष्ठ प्रदेश, यूरोप के अग्र प्रदेश की ओर खिसकने लगा जब कि यूरोप का अग्रप्रदेश स्थिर था। अत: स्थल का लगभग 1,000 मील लंबा भाग सिकुड़ गया जिससे टीथिज भू-अभिनति में मोड़ तथा दरारें पड़ीं और यूरोप में आल्प्स पर्वत का निर्माण हुआ। कोबर के अनुसार पर्वत-निर्माण-क्रिया में कोई अग्र प्रदेश या पृष्ठ प्रदेश नहीं होता है बल्कि दोनों ही अग्रप्रदेश होते हैं। दोनों प्रदेश भू-अभिनति की ओर खिसकते हैं। इससे दोनों ओर मोड़ पड़ते हैं, जो मध्यपिंड के दोनों ओर एक दूसरे की विपरीत दिशा में होते हैं। इनके मध्य में मध्यपिंड होता है।

कोबर के अनुसार हिमालय का निर्माण

कोबर के अनुसार टीथीज भू-अभिनति में भारतीय तथा एशियाई अग्रभागों से दबाव आया। अत: भू-अभिनति में दोनों ओर मोड़ पड़ गए जिससे दक्षिण तटीय हिमालय श्रेणियों तथा उत्तरी श्रेणियों का निर्माण हुआ। बीच के मध्य पिंड से तिब्बत के पठार का निर्माण हुआ।

पर्वत निर्माण के लिए आवश्यक तत्व

पर्वत निर्माण के लिए निम्नलिखित दशाएँ आवश्यक हैं :-

  • दो कठोर स्थिर भूखंडों का होना।
  • इसके बीच में भू-अभिनति का होना जिसमें पदार्थ भूखंडों से क्षयात्मक शक्तियों द्वारा कट कटकर जमा होता रहे तथा तली निरंतर नीचे को धँसती रहे।
  • बीच में मध्य पिंड का होना जिनका प्रभाव मोड़ पर पड़ता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

दुबे, रमेशचंद्र “खण्ड 7”, हिन्दी विश्वकोश (हिन्दी)। भारतडिस्कवरी पुस्तकालय: नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी, पृष्ठ संख्या- 124।

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