नाभादास  

इन पुस्तकों के अतिरिक्त इन्होंने दो 'अष्टयाम' भी बनाए एक ब्रजभाषा गद्य में, दूसरा रामचरितमानस की शैली पर दोहा चौपाइयों में। दोनों के उदाहरण इस प्रकार हैं -

गद्य
तब श्री महाराजकुमार प्रथम श्री वशिष्ठ महाराज के चरन छुइ प्रनाम करत भए। फिरि अपर वृद्ध समाज तिनको प्रनाम करत भए। फिरि श्री राजाधिराज जू को जोहार करिके श्री महेंद्रनाथ दशरथ जू के निकट बैठत भए।
पद्य

अवधपुरी की शोभा जैसी । कहि नहिं सकहिं शेष श्रुति तैसी॥
रचित कोट कलधौत सुहावन । बिबिधा रंग मति अति मन भावन॥
चहुँ दिसि विपिन प्रमोदअनूपा । चतुरवीस जोजन रस रूपा॥
सुदिसि नगर सरजूसरिपावनि । मनिमय तीरथ परम सुहावनि॥
बिगसे जलज भृंग रस भूले । गुंजत जल समूह दोउ कूले॥
परिखा प्रति चहुँदिसि लसति, कंचन कोट प्रकास।
बिबिधा भाँति नग जगमगत, प्रति गोपुर पुर पास॥


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