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ताड़पत्र (लेखन सामग्री) - भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर

ताड़पत्र (लेखन सामग्री)  

पोथियाँ तैयार करना

ग्रन्थ लिखने के लिए जिन ताड़पत्रों का उपयोग होता था, उन्हें पहले सुखा देते थे। फिर उन्हें कुछ घंटों तक पानी में उबालकर या भिगोए रखकर पुनः सुखाया जाता था। शंख, कौड़ी या चिकने पत्थर से उन्हें घोटते थे। फिर उन्हें इच्छित आकार में काटकर लोहे की कलम (शलाका) से उन पर अक्षर कुरेदे जाते थे। फिर पत्रों पर कज्जल पोत देने से अक्षर काले हो जाते थे। दक्षिण भारत में अधिकतर इसी तरह ताड़पत्र की पोथियाँ तैयार की जाती थीं। उत्तर भारत में ताड़पत्रों पर प्राय: स्याही से लेखनी द्वारा लिखा जाता था। संस्कृत में लिख् और धातु का अर्थ है कुरेदना, संस्कृत में लिप धातु का अर्थ है लीपना। अत: लगता है की ताड़पत्र पर कुरेदने (लिख्) से लेखन या लिखना शब्द बने और 'स्याही लेपन' से लिपि शब्द का प्रयोग शुरू हुआ।

जलवायु का प्रभाव

ताड़पत्रों के लिए गर्म जलवायु हानिकारक है, इसीलिए ज़्यादा संख्या में लिखे जाने पर भी ताड़पत्र पोथियाँ दक्षिण भारत में कम मिली हैं। राजस्थान, कश्मीर, नेपाल और तिब्बत जैसे सूखे और ठण्डे प्रदेशों में ताड़पत्र पोथियाँ अधिक संख्या में मिली हैं। नेपाल और तिब्बत की जलवायु इनके लिए ज़्यादा अनुकूल है। काग़ज़ और कपड़े पर ताम्रपत्र का विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। इसीलिए ताड़पत्रों के साथ इन्हें प्रायः नहीं रखा जाता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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