गोविंदस्वामी  

श्रीनाथ जी के साथ लीलाएँ

  • गोविंददास जी की भक्ति सख्‍य भाव की थी। श्रीनाथ जी साक्षात प्रकट होकर उनके साथ खेला करते थे। बाल-लीलाएं किया करते थे। गोविंददास सिद्ध महात्‍मा और उच्‍च कोटि के भक्त थे। एक बार रासेश्‍वर नन्‍दनन्‍दन उनके साथ खेल रहे थे। कौतुकवश गोविंददास ने श्रीनाथ जी को कंकड़ मारा। गोसाईं विट्ठलनाथ जी से पुजारी ने शिकायत की। गोविंददास ने निर्भयतापूर्वक उत्‍तर दिया कि आपके लाल ने तो तीन कंकड़ मारे थे। श्रीविट्ठलनाथ जी ने उनके सौभाग्‍य की सराहना की।
  • भक्‍तों की लीलाएं बड़ी विचित्र होती हैं। उनको समझने के लिए प्रेमपूर्ण हृदय चाहिये। एक बार गोविंददास जी श्रीनाथ जी के साथ गुल्‍ली खेल रहे थे। राजभोग का समय हो रहा था। भगवान बिना दांव दिये ही मन्दिर में चले गये। गोविंददास ने पीछा किया। श्रीनाथ जी को गुल्‍ली मारी। प्रेमराज्‍य में रमण करने वाले सखा की भावना मुखिया और पुजारियों की समझ में न आयी। उन्‍होंने उनको तिरस्‍कारपूर्वक मन्दिर से बाहर निकाल दिया। गोविंददास रास्‍ते पर बैठ गये। उन्‍होंने सोचा कि श्रीनाथ जी इसी मार्ग से जायंगे। बदला लेने में सुविधा होगी। उधर भगवान के सामने राजभोग रखा गया। मित्र रूठकर चले गये। विश्‍वपति के दरवाजे से अपमानित होकर गये थे। भोग की थाली पड़ी रह गयी। भगवान भोग स्‍वीकार करें, असम्‍भव बात थी। मन्दिर में हाहाकार मच गया। ब्रज के रंगीले ठाकुर रूठ गये। उन्‍हें तो उनके सखा ही मना पायेंगे। विट्ठलनाथ जी ने गोविंददास की बड़ी मनौती की। वे उनके साथ मन्दिर आ गये। भगवान ने राजभोग स्‍वीकार किया। गोविंददास ने भोजन किया। मित्रता भगवान के पवित्र यश से धन्‍य हो गयी।
  • एक बार पुजारी श्रीनाथ जी के लिये राजभोग की थाली ले जा रहा था। गोविंददास ने कहा कि- "पहले मुझे खिला दो।" पुजारी ने गोसाईं जी से कहा। गोविंददास ने सख्‍यभाव के आवेश में कहा कि- "आपके लाला खा-पीकर मुझसे पहले ही गाय चराने निकल जाते हैं।" गोसाईं जी ने व्‍यवस्‍था कर दी कि राजभोग के साथ ही साथ गोविंददास को भी खिला दिया जाय।
  • भगवान को जो जिस भाव से चाहते हैं, वे उसी भाव से उनके वश में हो जाते हैं। एक समय गोविंददास को श्रीनाथ जी ने प्रत्‍यक्ष दर्शन दिया। वे श्‍यामढाक पर बैठकर वंशी बजा रहे थे। इधर मन्दिर में उत्‍थापन का समय हो गया था। गोसाईं जी स्‍नान करके मन्दिर में पहुंच गये थे। श्रीनाथ जी उतावली में वृक्ष से कूद पड़े। उनका बागा वृक्ष में उलझकर फट गया। श्रीनाथ जी का पट खुलने पर गोसाईं विट्ठलनाथ ने देखा कि उनका बागा फटा हुआ है। बाद में गोविंददास ने रहस्‍योद्घाटन किया। गोसाईं जी को साथ ले जाकर वृक्ष पर लटका हुआ चीर दिखलाया। गोविंददास का सखा भाव सर्वथा सिद्ध था।
  • कभी-कभी कीर्तन गान के समय श्रीनाथ जी स्‍वयं उपस्थित रहते थे। एक बार उन्‍हें श्रीनाथ जी ने राधारानी सहित प्रत्‍यक्ष दर्शन दिये। श्रीनाथ जी स्‍वयं पद गा रहे थे और श्रीराधा जी ताल दे रही थीं। गोविंददास ने श्रीगोसाईं जी से इस घटना का स्‍पष्‍ट वर्णन किया।
  • श्रीनाथ जी उनसे प्रकट रूप से बात करते थे, पर देखने वालों की समझ में कुछ भी नही आता था। एक समय श्रृंगार दर्शन में श्रीनाथ जी की पाग ठीक रूप से नहीं बांधी गयी थी। गोविंददास ने मन्दिर में प्रवेश करके उनकी पाग ठीक की। भक्तों के चरित्र की विलक्षणता का पता भगवान के भक्‍तों को ही लगता है।

मृत्यु

गोविंदस्‍वामी ने गोवर्धन में एक कन्‍दरा के निकट संवत 1642 (1585 ई.) विक्रमी में लीला-प्रवेश किया। उन्‍होंने आजीवन श्रीराधा-कृष्ण की श्रृंगार-लीला के पद गाय। भगवान को अपनी संगीत और काव्‍य-कला से रिझाया।

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