गोविंदस्वामी  

अष्टछाप के कवि

गोविंददास स्‍वरचित पदों को श्रीनाथ जी के सम्‍मुख गाया करते थे। भक्ति पक्ष में उन्‍होंने दैन्‍य-भाव कभी नहीं स्‍वीकार किया। जिनके मित्र अखिल लोकपति साक्षात नन्‍दनन्‍दन हों, दैन्‍य भला उनका स्‍पर्श ही किस तरह कर सकता है। गोविंददास का तो स्‍वाभिमान भगवान की सख्‍य-निधि में संरक्षित और पूर्ण सुरक्षित था। गोसाईं विट्ठलनाथ ने उन्‍हें कवीश्‍वर की संज्ञा से समलंकृत कर 'अष्‍टछाप' में सम्मिलित किया था। संगीत सम्राट तानसेन उनकी संगीत-माधुरी का आस्‍वादन करने के लिये कभी-कभी उनसे मिलने आया करते थे।

  • एक समय आंतरी ग्राम से कुछ परिचित व्‍यक्ति गोविंददास से मिलने आये। वे यशोदा घाट पर स्‍नान कर रहे थे। उन्‍होंने गांव वालों को पहचान लिया, पर वे नहीं जान सके कि गोविंदस्‍वामी वे ही हैं। उन्‍होंने गोविंददास से पूछा कि- "गोविंदस्‍वामी कहां हैं।" गोविंददास ने कहा- "वे मरकर गोविंददास हो गए।" गांव वालों ने उनका चरण स्‍पर्श किया। उनके पवित्र दर्शन से अपने सौभाग्‍य की सराहना की।

भैरव राग गायन

एक दिन गोविंददास यशोदा घाट पर बैठकर बड़े प्रेम से भैरव राग गा रहे थे। प्रात:काल के शीतल शान्‍त वातावरण में चराचर जीव तन्‍मय होकर भगवान की कीर्तिमाधुरी का पान कर रहे थे। बहुत-से यात्री एकत्र हो गये। भक्त भगवान के रिझाने में निमग्‍न थे। वे गा रहे थे-

"आओ मेरे गोविंद, गोकुल चंदा।
भइ बड़ि बार खेलत जमुना तट, बदन दिखाय देहु आनंदा।।
गायन कीं आवन की बिरियां, दिन मनि किरन होति अति मंदा।
आए तात मात छतियों लगे, 'गोबिंद' प्रभु ब्रज जन सुख कंदा।।"

भक्त के हृदय के वात्‍सल्‍य ने भैरव राग का माधुर्य बढ़ा दिया। श्रोताओं में बादशाह अकबर भी प्रच्‍छन्‍न वेष में उपस्थित थे। उनके मुख से अनायास "वाह-वाह" की ध्‍वनि निकल पड़ी। गोविंददास पश्‍चाताप करने लगे और उन्‍होंने उसी दिन से श्रीनाथ जी के सामने भैरव राग गाना छोड़ दिया। उनके हृदय में अपने प्राणेश्‍वर प्रेमदेवता ब्रजचन्‍द्र के लिये कितनी पवित्र निष्‍ठा थी।

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