कुश्ती की पद्धतियाँ  

भारतीय कुश्ती का विशेष महत्व है, इसलिए इन कुश्तीयों को एक विशेष नाम से जाना जाता है। भारतीय कुश्ती को निम्न चार पद्धतियों में बाटाँ गया है-

  1. भीमसेनी कुश्ती
  2. हनुमंती कुश्ती
  3. जांबवंती कुश्ती
  4. जरासंधी कुश्ती

भीमसेनी कुश्ती

इस कुश्ती का नाम महाभारत पाण्डव भीम के नाम पर है। इस कुश्ती में शरीर की शक्ति का विशेष होता महत्व है।

हनुमंती कुश्ती

एक रणनीति के आधार पर दुश्मन से उबरने के लिए यह कुश्ती बनाई है। हनुमंती कुश्ती में दाँव पेंच और कला की प्रधानता होती है।

जाबवंती कुश्ती

जाबवंती कुश्ती में हाथ-पैर से इस प्रकार प्रयास किया जाता है कि प्रतिस्पर्धी चित्त न कर पाए, उसमें शारीरिक शक्ति और दाँवपेंच की अपेक्षा शरीर साधना का महत्व है।

जरासंधी कुश्ती

इस कुश्ती का नाम राक्षस जरासंध के नाम पर है, इसमें में हाथ-पाँव मोड़ने का प्रयास प्रधान है।

मल्लयुद्ध में प्रसिद्धि

मल्लयुद्ध के माध्यम से भारत का विदेशों में संपर्क व प्रसिद्धि 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक में हुआ। सन 1892 ई. में इंग्लैंड का प्रसिद्ध मल्ल टाम कैनन, रुस्तमेहिंद गुलाम से लड़ने के लिए भारत आया, किंतु वह गुलाम के शिष्य करीम बख्श से हारकर लौट गया। गुलाम का छोटा भाई कल्लू भी अपने युग का प्रसिद्ध पहलवान था। उस समय के अन्य प्रसिद्ध मल्लों में किक्करसिंह का नाम उल्लेखनीय है, जिसका भार लगभग 7 मन तथा वक्ष:स्थल की परिधि 70 इंच थी। सन 1900 ई. में स्वर्गीय मोतीलाल नेहरू, गुलाम तथा कल्लू को लेकर पेरिस की विश्व प्रदर्शिनी में गए। गुलाम की कुश्ती यूरोप के प्रसिद्ध मल्ल अहमद मद्राली से हुई जो बराबर पर छूटी। गुलाम की मृत्यु के पश्चात् कल्लू रुस्तमेहिंद हुए।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कुश्ती की पद्धतियाँ (हिन्दी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2015।
  2. चैंपियन ऑव चैंपियन्स

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