कजरी  

कजरी या 'कजली' महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला लोकगीत है, जो उत्तर प्रदेश में काफ़ी प्रचलित है। परिवार में किसी मांगलिक अवसर पर महिलाएँ समूह में कजरी गायन करतीं हैं। महिलाओं द्वारा समूह में प्रस्तुत की जाने वाली कजरी को 'ढुनमुनियाँ कजरी' कहा जाता है। भारतीय पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष की तृतीया को सम्पूर्ण पूर्वांचल में 'कजरी तीज' पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन महिलाएँ व्रत करतीं हैं। शक्ति स्वरूपा माँ विंध्यवासिनी का पूजन-अर्चन करती हैं और 'रतजगा'[1] करते हुए समूह बना कर पूरी रात कजरी गायन करती हैं। ऐसे आयोजन में पुरुषों का प्रवेश वर्जित होता है। यद्यपि पुरुष वर्ग भी कजरी गायन करता है, किन्तु उनके आयोजन अलग होते हैं।

उत्पत्ति

'कजरी' की उत्पत्ति कब और कैसे हुई, यह कहना कठिन है, परन्तु यह तो निश्चित है कि मानव को जब स्वर और शब्द मिले, और जब लोक जीवन को प्रकृति का कोमल स्पर्श मिला होगा, उसी समय से लोकगीत हमारे बीच हैं। प्राचीन काल से ही उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जनपद माँ विंध्यवासिनी के शक्तिपीठ के रूप में आस्था का केन्द्र रहा है। अधिसंख्य प्राचीन कजरियों में शक्तिस्वरूपा देवी का ही गुणगान मिलता है। आज कजरी के वर्ण्य-विषय काफ़ी विस्तृत हैं, परन्तु कजरी गायन का प्रारम्भ देवी गीत से ही होता है।[2]

वर्षा ऋतु का चित्रण

भारत के हर प्रान्त के लोकगीतों में वर्षा ऋतु को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उत्तर प्रदेश के प्रचलित लोकगीतों में ब्रज का मलार, पटका, अवध की सावनी, बुन्देलखण्ड का राछरा तथा मिर्जापुर और वाराणसी की 'कजरी'। लोक संगीत के इन सब प्रकारों में वर्षा ऋतु का मोहक चित्रण मिलता है। इन सब लोक शैलियों में 'कजरी' ने देश के व्यापक क्षेत्र को प्रभावित किया है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. रात्रि जागरण
  2. 2.0 2.1 2.2 2.3 कजरी (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 12 अक्टूबर, 2012।
  3. संयोग और वियोग

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