ओड  

ओड मिश्र छंद के ढाँचे में, सामान्यत: ओजपूर्ण स्वर और उच्च शैली की, एक सार्वभौम अभिरुचिवाली विषयवस्तु से युक्त संबोधनपरक कविता है। नृत्य एवं संगीत वाद्यों के साथ गाए जानेवाले यूनानी समवेत गीतों में इसका मूल उद्गम निहित है।

यूनान में, ओडों का मुख्य आदर्श यूनानी दु:खांतों के सहगानों में प्राप्त था। छंद की दृष्टि से ये ओड अपनी रचना में अत्यंत मिश्र थे, जो तीन भागों में विभक्त हैं–स्ट्रोफ़ी (ग्रीक अर्थ उ मोड़) जो नर्तकों की दाएँ से बाएँ जाने की गति का प्रतिनिधान करते हुए ऐंटीस्ट्रोफ़ी द्वारा संतुलित होता था। यह उस समय गाया जाता था जब यह सहगान दाएँ से बाएँ की ओर मुड़ता था और इपोड, जिसे नर्तक स्थिर खड़े होकर (समवेत गीतों में, गिरजाघर की वेदी के संमुख) गाते थे और जो विशेष अवसरों पर ही होता था। एल्कमैन (630 ई.पू.) ने सर्वप्रथम स्ट्रोफ़ी को अपनी कविता पाथोनियम में सुनियोजित करके प्रस्तुत किया किंतु ऐसी योजना वाले ओड पिंडरी के नाम से प्रसिद्ध हैं क्योंकि पिंडर (522-442 ई.पू.) ने इस ढाँचे का प्रयोग अपने विजय संबंधी ओडों में किया था। ये विजय ओड ओलिंपिक खेलों में विजयी होने के अवसर पर लिखे गए थे।

ओड का आधुनिक रूप एक संबोधन काव्य जैसा है जिसका आरंभ रोमन कवि होरेस (65-8 ई.पू.) के ओड से होता है। होरेस की 'कार्मिना' (जो सदा ओडों के रूप में अनूदित हुई है) उन छंदों से युक्त है जिनको यूनानी मांडिक गीतों में माँजा गया था; विशेष रूप से साफ़ो (620 ई.पू.), एल्सीयस (611-580 ई.पू.) तथा एनैक्रियन (563-478 ई.पू.) के गीतों में। होरेस के प्राय: सभी ओड किसी वस्तु अथवा व्यक्ति को संबोधित करके लिखे गए हैं और उनमें से कुछ बड़ी गंभीरता से रोम एवं रोमन नैतिक जीवन की महत्ता का गान करते हैं।

पुनर्जागरणकालीन शास्त्रीय स्वरूप के उत्थान के साथ ही साथ अनेक देशों के कवियों ने ओड को अपनाया। फ्रांसीसी कवि पियर रोंसार्द ने पिंडरी शैली को अपने कुछ ओडों (1552-55 ई.) में अनुकृत करने की चेष्टा की। इतालवी कवि पेत्रार्क ने अपनी देशभक्तिपरक कविताओं–'इतालिआमिआ' तथा 'स्पिरितोजेंतील' (रिएज़ी को संबोधित) में होरेसीय पद्धति का अनुगमन किया।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 295 |

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