ऑटिज़्म  

ऑटिज़्म से जुड़े शोध और प्रयोग

आज कई रिसर्च इंस्टीटयूट द्वारा ऑटिज़्म के कारणों व निदान पर निरन्तर शोध कार्य जारी है। ये शोध ऑटिज़्म प्रभावितों के लिए कितने लाभकारी हैं भविष्य में तय होगा।

सिर्फ़ 15 मिनट में पहचाना जाएगा ऑटिज़्म

लंदन के किंग्स कॉलेज के वैज्ञानिकों की एक टीम ने युवाओं में ऑटिज़्म की पहचान करने के लिए ब्रेन स्कैन का तरीक़ा ढूंढा है, जो मात्र 15 मिनट में ही इस बीमारी की पहचान कर लेगा। हालांकि अभी तक ऑटिज़्म की पहचान करने के लिए पीड़ित व्यक्ति के परिवार वालों और दोस्तों से ली गई व्यक्तिगत जानकारियों को ही आधार बनाया जाता है। सबसे बड़ी बात है कि इस स्कैन की प्रामाणिकता 90 प्रतिशत से भी ज़्यादा होगी। अपने इस प्रयोग में किंग्स कॉलेज के मनोचिकित्सा संस्थान के वैज्ञानिकों ने पहले एमआरआई स्कैनर के ज़रिये मस्तिष्क के कुछ भागों का चित्र लिया। इसके बाद एक भिन्न प्रकार की इमेजिंग तकनीक के सहयोग से इन स्कैन किए हुए चित्रों को त्रिआयामी (थ्रीडी) चित्रों में पुनर्निर्मित किया गया, जिसके आकार, प्रकार और बनावट का कंप्यूटर के ज़रिये आंकलन किया गया। इन जटिल प्रक्रियाओं के द्वारा ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर को स्पष्ट किया गया। हालांकि इस बारे में आलोचकों का कहना है कि इस प्रक्रिया को उपयोग में लाने के लिए विशेषज्ञों के समूह की ज़रूरत होगी, जो प्राप्त जानकारी की व्याख्या कर उसकी पहचान कर सकें।

5 मिनट में ब्रेन स्कैन से पता चलेगा ऑटिज़्म का

बच्चों को होने वाली बीमारी ऑटिज़्म का पता आमतौर पर काफ़ी देर बाद चलता है। इसकी वजह से इलाज़ का ज़्यादा असर नहीं हो पाता। लेकिन वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेडिसिन के वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क की स्कैनिंग की एक ऐसी विधि खोज निकाली है जिससे बच्चों के दिमाग की परिपक्वता का पता लगाया जा सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस विधि से बच्चों की मस्तिष्क की विकृतियों (अटेंशन डेफिशीट) और ऑटिज़्म संबंधी गड़बड़ियों का समय रहते पता लगाया जा सकेगा। पांच मिनट की अवधि वाली स्कैनिंग में एमआरआई आंकड़ों का गणितीय रूप में ट्रांसफर करना शामिल है। यह न केवल मस्तिष्क की संरचना की तस्वीरें, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों के साथ मिलकर काम करने के इसके तरीक़ों को भी ज़ाहिर करता है। वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेडिसिन में मुख्य अनुसंधानकर्ता ब्रेडले श्लेगर ने कहा कि यह विधि ऑटिज़्म पीड़ित बच्चों तथा सामान्य बच्चों की तंत्रिकाओं के विकास के संबंध में जानकारी देगी। इस विधि से बाल्यावस्था में ही मस्तिष्क की तरंगों की स्कैनिंग कर जांच की जा सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे अप्रभावित बच्चों की तुलना में आवाज़ को 11 मिलीसेकंड बाद पहचान पाते हैं। यही देरी ब्रेन स्कैन में पकड़ी जा सकती है।

पेशाब के परीक्षण से ऑटिज़्म का पता लगाएं

लंदन इंपीरियल कॉलेज (आईसी) के प्रोफेसर जर्मी निकोलस का कहना है कि ऑटिज़्म रोगी की सामाजिक कुशलता पर आघात पहुंचाता है। ऑटिज़्म शरीर के कई अंगों को प्रभावित करता है। इसे आसानी से देखा भी जा सकता है कि यह किस तरह संबंधित रोगी के मेटाबोलिज्म और साहस को कैसे ठेस पहुंचाता है। निकोलस ने बताया कि ऐसे तो ऑटिज़्म कई अंगों को प्रभावित करता है, पर इसका सीधा असर मानव की सामाजिक कुशलता और समझ पर होता है। अन्य व्यक्तियों से वार्तालाप करने तथा उनकी समझदारी को भी समझने में परेशानी आती है। उन्होंने बताया कि अध्ययन में यह पाया गया कि यूरिन टेस्ट से ऑटिज़्म का पहले पता लगाया जा सकता है। निकोलस ने अपने अध्ययन के बारे में बताया कि वर्तमान में बच्चों में ऑटिज़्म को आंकने की प्रक्रिया काफ़ी लंबी है। इसके लिए सामाजिक वार्तालाप, सोचन की क्षमता आदि-आदि कई प्रकार के टेस्ट किए जाते हैं। इसके बाद ऑटिज़्म का पता लगाया जाता है, पर यूरिन टेस्ट के जरिए इसे पहले ही आंका जा सकता है।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में 18 महीने से कम उम्र के बच्चों में ऑटिज़्म का पता लगाया जाना काफ़ी मुश्किल का काम है। शोधकर्ताओं ने तीन से नौ वर्ष के बच्चों को तीन वर्ग में बांटकर अपना शोध किया। इन सभी बच्चों का यूरिन टेस्ट किया गया। इनमें 39 बच्चे ऐसे थे, जिनका पहले ही ऑटिज़्म का निदान कर दिया गया, 28 ऐसे बच्चे थे, जो ऑटिज़्म से ग्रसित थे और 34 ऐसे बच्चे थे, जो ऑटिज़्म के कभी भी शिकार नहीं हुए।

जेनेटिक मिसफोल्डिंग और ऑटिज़्म में है गहरा संबंध

वैज्ञानिकों ने ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) यानी स्वलीनता से संबंधी मस्तिष्क में पाए जाने वाले एक मुख्य प्रोटीन में जेनेटिक मिसफोल्डिंग की पहचान की है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने पाया कि न्यूरोलिगिन-3 नामक प्रोटीन में आनुवांशिक परिवर्तन की वजह से जेनेटिक मिसफोल्डिंग हो जाती है और दूसरी अन्य विसंगतियां आ जाती हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक जेनेटिक मिसफोल्डिंग की वजह से तंत्रिकाओं के बीच असामान्य संचार होता है। ऑटिज़्म के मरीज़ों में इस प्रोटीन में आनुवांशिक परिवर्तन पाया गया है। यह शोध ‘बायोलॅजिकल केमिस्ट्री’ में प्रकाशित हुआ है।

अपने में लीन रहने के पीछे डीएनए ज़िम्मेदार

पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक जो बच्चे स्वलीन होते हैं, उनके डीएनए में दुर्लभ प्रकार का उत्परिवर्तन होता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक ऐसे बच्चों के माता-पिता के डीएनए सामान्य होते हैं और इसलिए कोई समस्या नहीं होती लेकिन वे डीएनए के कुछ हिस्से की अधिकता और कुछ की कमी के साथ जन्म लेते हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि एक दिन उनका अध्ययन साधारण डीएनए टेस्ट में मदद करेगा, जिससे पहले ही बच्चों के इस गुण को पहचाना जा सकेगा। लेकिन यह कई बार ऑटिज़्म (स्वलीनता) वाले प्रत्येक बच्चे की पहचान नहीं भी कर पाएगा क्योंकि इसके लिए अन्य कारक भी ज़िम्मेदार हैं। अध्ययन बताता है कि अपने आप में लीन रहने वाले बच्चों में आनुवांशिक उत्परिवर्तन क़रीब 20 प्रतिशत सामान्य होते हैं।

चीन में डॉल्फिन से ऑटिज़्म पीड़ित बच्चों का इलाज़

चीन के एक समुद्री मनोरंजन पार्क ने चार डॉल्फिन ख़रीदी लेकिन इन्हें मनोरंजन की दृष्टि से नहीं बल्कि ऑटिज़्म (स्वलीनता) से पीड़ित बच्चों के इलाज़ के लिए ख़रीदा गया। समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक लियाओनिंग प्रांत के फुशहुन शहर के ‘रॉयल ओशन वर्ल्ड’ में जानवरों की देख-रेख करने वाले चेन रुजुन ने बताया कि इन डॉल्फिन को जापान से 738,000 डॉलर में ख़रीदा गया है। एक महीने के अनुकूलन और प्रशिक्षण के बाद युवा मरीज़ों के इलाज़ के लिए इनका इस्तेमाल शुरू कर दिया गया है। चेन कहते हैं कि, " ‘रॉयल ओशन वर्ल्ड’ 2007 से ही ऑटिज़्म पीड़ित बच्चों का इलाज़ कर रहा है। जब हमारे पास चिकित्सकों के रूप में तीन डॉल्फिनें थीं तब हम 2 से 10 वर्ष उम्र तक के 20 से ज़्यादा बच्चों का इलाज़ कर लेते थे।" उन्होंने बताया कि प्रत्येक बच्चा महीने में कम से कम 12 बार पार्क में आता है और इलाज़ के तहत डॉल्फिन के साथ खेलता है। इस इलाज़ का असर इस पर निर्भर करता है कि बच्चे ने डॉल्फिन के साथ कितना समय बिताया। पहले बच्चों का इलाज़ नि:शुल्क किया जाता था लेकिन इस इलाज़ की मांग बढ़ने के साथ अब इसके लिए प्रत्येक परिवार से प्रति माह 2000 युआन लिए जाते हैं। ग़रीब परिवारों से कम शुल्क लिया जाता है। चीन के शैनडोंग और गुआंगडोंग सहित अन्य प्रांतों के समुद्री पार्को में भी डॉल्फिन इलाज़ होता है।

ऑटिज़्म के इलाज़ में मददगार हो सकती हैं सांगबर्ड

लंदन में हुए एक नए अध्ययन से पता चला है कि एक नन्हीं सांगबर्ड स्वलीनता सहित अन्य विसंगतियों को दूर करने में मददगार हो सकती है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के अध्ययनकर्ता क्रिस पोंटिंग का मानन है, "गाना सीखना हर प्रकार के सीखने का एक उत्कृष्ट प्रतिमान है।" यह नन्हीं सी चिड़िया मनुष्य के सीखने और स्मृति की प्रक्रिया को समझने में महत्त्वपूर्ण हो सकती है। सांगबर्ड के नर बच्चों मानव शिशुओं की तरह ही अपने पिता के गाने की नकल सीखने से पहले तुतलाहट के साथ बोलना शुरू करते हैं। इस चिड़िया के सीखने की यह प्रक्रिया मनुष्यों में स्वलीनता, सदमे, हकलाहट और परकिंसंस जैसे विकारों को समझने में सहायक हो सकती है।

बच्चों की आवाज़ से पकड़ में आएगा ‘ऑटिज़्म’

ऑटिज़्म का जल्द पता लगाने और इसके इलाज़ का मार्ग प्रशस्त करने का दावा करते हुए वैज्ञानिकों ने पहली स्वचालित स्वर विश्लेषण व्यवस्था विकसित की है। इस पद्धति में बच्चों की आवाज़ का विश्लेषण कर उनमें रोग को शुरुआती अवस्था में पकड़ना संभव होगा। वैज्ञानिकों ने लैंग्वेज इनवार्यनमेंट एनालिसिस (लेना) उपकरण का विकास किया है। उन्होंने कहा कि ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चे अपने हम उम्र स्वस्थ बच्चों की तुलना में अलग प्रकार से उच्चारण करते हैं। यह उपकरण बच्चों की आवाज़ को पकड़ लेता है। इस मशीन में पहले से अन्य बच्चों की आवाज़ें दर्ज होती है। पहले यह मशीन दिन भर बच्चों के आवाज़ को रिकार्ड करती है और संबंधित आंकड़े एक विशेष कंप्यूटर में दर्ज करती है जो अन्य बच्चों की ध्वनियों से इसकी तुलना करता है।

ऑटिज़्म के शिकार लोग आलिंगन से क्यों बचते हैं

वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क में कुछ ऐसे सबूत ढूंढे हैं जिनसे यह पता चल सकेगा कि ऑटिज़्म से जुड़े नाज़ुक एक्स सिंड्रोम से ग्रसित लोग अपने माता पिता से भी गले मिलना क्यों नापसंद करते हैं। नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के फेनबर्ग स्कूल ऑफ मेडिसीन के शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि उन्होंने नाज़ुक एक्स सिंड्रोम वाली चुहिया के मस्तिष्क में संवेदी कोर्टेक्स के विकास में देरी का पता लगाया है। न्यूरोन जर्नल में उन्होंने अपनी इस कामयाबी के बारे में बताया है कि उनका अध्ययन इस बात की व्याख्या करने में मदद कर सकता है कि इससे ग्रसित लोग शारीरिक संपर्क को लेकर अत्यंत संवेदनशील क्यों होते हैं। गौरतलब है कि नाज़ुक एक्स सिंड्रोम एक्स क्रोमोजोम में जीन से पैदा होता है, जो नाज़ुक एक्स मानसिक मंदता यानी एफएमआरपी नाम के प्रोटीन बनाता है।

नवजात में पीलिया होने पर ऑटिज़्म का भी ख़तरा

जिन नवजात शिशुओं को पीलिया होता है उन्हें आगे चलकर ऑटिज़्म बीमारी हो सकती है। यह बात एक अध्ययन में सामने आई है। डेनमार्क की अरहस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 1994 से 2004 के बीच देश में जन्मे बच्चों के बारे में अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि जिन बच्चों का पीलिया के लिए इलाज़ किया गया था उनमें से 2.37 फीसदी बच्चे बाद में ऑटिज़्म के शिकार हुए। जबकि जिन बच्चों को पीलिया नहीं था उनमें से केवल 1.4 प्रतिशत बच्चों को ऑटिज़्म की शिकायत हुई। शोधकर्ताओं का मानना है कि पीलिया के दौरान जमा हुआ ज़हरीला बिलिरुबिन दिमाग की कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त कर देता है।

सोशल नेटवर्किंग से ऑटिज़्म

सोशल नेटवर्किंग से जहां विश्व एक छोटे गांव में तब्दील हो गया है वहीं इससे लोगों का समय भी कटता है। लेकिन यही सोशल नेटवर्किंग अगर लत में तब्दील हो जाए तो घातक साबित हो सकती है। यहां तक कि सोशल नेटवर्किंग से ऑटिज़्म का ख़तरा हो सकता है। मैरीलैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 200 छात्रों पर किए गए अध्ययन के दौरान यह पाया है कि सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर ज़्यादा समय बिताने वाले युवा नकारात्मक व्यवहार के शिकार हो जाते हैं। अगर एक दिन के लिए भी वे इन वेबसाइटों से दूर रहे तो वे अत्यधिक उन्मत्त हो उठते हैं, उनमें व्यग्रता और घबराहट होने लगती है। ठीक यही लक्षण ड्रग और अल्कोहल के आदी लोगों में भी व्यसन से दूर रहने पर पाया जाता है। इन नतीजों के आधार पर लोगों का ध्यान एक बार फिर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट के ख़तरों की तरफ दिलाया गया है। इस शोध से जुड़ी न्यूरोसाइंटिस्ट सूसन ग्रीनफील्ड ने बताया कि 2009 में कुछ ऐसी ख़बरें आई थी कि सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट हमारे शरीर और दिमाग को बुरी तरह प्रभावित करती है और हमारी एकाग्रता की क्षमता को काफ़ी कम कर देती है। इसके अलावा इससे प्रतिरोधक क्षमता भी काफ़ी कमज़ोर हो जाती है और ऑटिज़्म नाम के मनोरोग के होने की संभावना बढ़ जाती है। उनका कहना है कि सोशल नेटवर्किंग साइट की लत हमारे युवाओं में मस्तिष्क के विकसित होने की प्रक्रिया को बिगाड़ देती है। इसके अलावा मेलजोल के लिए सोशल साइट्स पर ज़्यादा वक़्त बिताने वाले युवाओं का स्वास्थ्य आमने-सामने संपर्क करने वाले युवाओं की तुलना में ज़्यादा ख़राब होता है। लेकिन इस स्टडी के आधार पर अभी तक वैज्ञानिकों ने कोई ठोस राय नहीं बनाई है।

योग से ‘ऑटिज़्म’ का इलाज़ सम्भव

ऑस्ट्रेलिया में आत्मविमोह (ऑटिज़्म) की समस्या से निपटने के लिए योग का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इस प्राचीन भारतीय विज्ञान की उपयोगिता में विश्वास रखने वाले विशेषज्ञ का मानना है कि योग की बदौलत ऑटिज़्म के शिकार बच्चों की मानसिक सक्रियता में बदलाव लाया जा सकता है। एक गैर-लाभकारी संगठन ‘योगा इन कम्युनिटी’ (वाईआईटीसी) भी इस उद्देश्य से योग का इस्तेमाल कर रहा है। इस संगठन के मुताबिक बच्चों की मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक सेहत को सुधार कर आत्मविमोह यानी ऑटिज़्म से निपटा जा सकता है। योग को यह संगठन इन तीनों तरह की सेहत के लिए उपयोगी मानता है। सिडनी स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी द्वारा प्रकाशित एक जर्नल प्रेसिंक्ट के मुताबिक यह संगठन योग की उपयोगिता की वैज्ञानिक पुष्टि कर चुका है।

हाल ही में 33 वर्षीय स्यू व्हाइट और 28 वर्षीया केटी स्पीयर्स ने इस संगठन की स्थापना की। आस्ट्रेलिया में वैकल्पिक इलाज़ पद्घतियों की बढ़ती उपयोगिता से लोगों को योग की ओर मुड़ने की प्रेरणा मिली है। इस संगठन के योग स्टूडियो में हर रोज़ मोमबत्ती जलाई जाती है और फूलों और खुशबू से योग कक्ष के माहौल को खुशनुमा बनाया जाता है। फिर इस खुशनुमा माहौल में बच्चों से योग करवाया जाता है। स्पीयर्स ने कहा, “यह योग केंद्र मानसिक शांति की तलाश कर रहे लोगों के लिए बेहद उपयुक्त जगह है। लोग जब यहां विभिन्न मुद्राओं को आजमा लेते हैं, तब उनकी मानसिक और शारीरिक ताजगी देखते ही बनती है। ख़ासकर बच्चों के लिए योग को अधिक उपयोगी माना जा रहा है। यहाँ कई छात्र ऑटिज़्म के इलाज़ में योग की उपयोगिता का अध्ययन भी कर रहे हैं।” सूर्य नमस्कार जैसी योग मुद्राओं का ख़ास तौर पर अध्ययन किया जा रहा है। वैसे बचपन में आत्मविमोह का शिकार रहे युवकों पर भी योग का उत्साहवर्धक असर देखा जा रहा है।

कुछ अन्य शोध
  • बी.एम.सी. पीडियाट्रिक्स की रिर्पोट के मुताबिक प्रेशराइज्ड आक्सीजन चैम्बर में आटिस्टिक बच्चों को दिन में दो बार, चार हफ्ते तक रखने से 80 प्रतिशत बच्चों में सुधार के लक्षण दिखाई दिए। उनकी अतिक्रियाशीलता (हाइपर एक्टिविटी), तुनक मिज़ाजी, एवं बोलने की क्षमता का विकास हुआ। समझा जाता है कि मस्तिष्क में आक्सीजन का स्तर बढ़ने से बच्चों को फ़ायदा हुआ होगा। फ्लोरिडा, इन्टरनेशनल चाइल्ड डेवलॅपमेंट रिर्पोट ने इस पर शोध किए जाने की ज़रूरत है।
  • जापान के एक शोधकर्ता के अनुसार कम उम्र में पिता बनने वाले पुरुषों के बच्चों की तुलना में अधिक उम्र में पिता बनने वाले पुरुषों के बच्चों को स्वलीनता यानि ऑटिज़्म का ख़तरा बढ़ जाता है।
  • संगीत भी आटिस्टिक बच्चों में मददगार साबित हो सकता है। एवर्स्टन में नार्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी की प्रयोगशाला में किए गए शोध के अनुसार वाद्ययन्त्र बजाने से ब्रेनस्टेम (मस्तिष्क का निचला हिस्सा) में स्वचालित प्रक्रिया पर असर पड़ता है। कई वर्षो का संगीत प्रशिक्षण ध्वनियों से भाषा और भावनाओं को व्यक्त करने में भी सुधार हो सकता है।[1]

ऑटिज़्म पर बनी फ़िल्में और टी. वी. प्रोग्राम

  • कोई मिल गया
  • तारे ज़मीन पर
  • माई नेम इज़ ख़ान
  • अंजलि

समाचार

ऑटिज़्म के इलाज़ की जगी नई उम्मीदें

शुक्रवार, 9 सितंबर, 2011

पहली बार एक बड़ी खोज में वैज्ञानिकों को ऑटिज़्म से जुड़े दो अलग अलग जैविक तनाव का पता चला है जिनके बारे में उनका दावा है कि इससे बीमारी के प्रभावी इलाज़ का विकास हो सकेगा। इन खोजों की तुलना 1960 के दशक में हुई कैंसर के विभिन्न प्रकारों की खोजों से की जा रही है और इनसे उम्मीद जागी है कि इनसे ऑटिज़्म ग्रस्त बच्चों के संपर्क, सामाजिकरण और अन्य समस्याओं को ज़्यादा आसानी और जल्दी से निपटा जा सकेगा। कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के डेविस माइंड इंस्टीट्यूट के अनुसंधानकर्ताओं ने दो से ढाई साल के उम्र के क़रीब 350 शिशुओं के दिमागी विकास, अनुवाशिंक बनावट और आसपास के वातावरण का अध्ययन किया। अध्ययन के मुताबिक शिशुओं के एक समूह-जिनमें सभी लड़के थे-के दिमाग बड़े पाए गए और 18 महीने के होने के बाद ज़्यादातर में ऑटिज़्म के लक्षण पाए गए जबकि एक अन्य समूह में प्रतिरक्षा प्रणाली को सही काम करते नहीं पाया गया।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 1.4 अरोरा, श्रीमती राजबाला। ऑटिज़्म: शीघ्र हस्तक्षेप ज़रूरी (हिन्दी) (पी.एच.पी) ग्वालियर टाइम्स। अभिगमन तिथि: 5 दिसंबर, 2010।
  2. जानें क्या है ऑटिज़्म? (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) वेब दुनिया हिन्दी। अभिगमन तिथि: 19 फ़रवरी, 2011
  3. ऑटिज़्म (आत्मविमोह) (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल)। । अभिगमन तिथि: 5 दिसंबर, 2010।
  4. ऑटिज़्म और भ्रांतियाँ (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) वेब दुनिया हिन्दी। अभिगमन तिथि: 19 फ़रवरी, 2011
  5. 5.0 5.1 ऑटिज़्म होने के क्या कारण है? (हिन्दी) (पी.एच.पी) ऑटिज़्म। अभिगमन तिथि: 19 फ़रवरी, 2011

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