अरुण खेत्रपाल  

अरुण खेत्रपाल
अरुण खेत्रपाल
पूरा नाम सेकेंड लेफ़्टिनेंट अरुण खेत्रपाल
जन्म 14 अक्तूबर, 1950
जन्म भूमि पूना, महाराष्ट्र
शहादत 16 दिसम्बर, 1971
स्थान बारापिंड, शकरगढ़, पंजाब
अभिभावक श्री मदन लाल खेत्रपाल (पिता)
सेना भारतीय थल सेना
रैंक सेकेंड लेफ़्टिनेंट
यूनिट 17 पूना हॉर्स
सेवा काल 1971 (6 माह)
युद्ध भारत-पाकिस्तान युद्ध (1971)
सम्मान परमवीर चक्र (1971)
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी अरुण खेत्रपाल के परदादा सिक्ख सेना में कार्यरत थे और 1848 में उन्होंने ब्रिटिश सेना के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी थी।

सेकेंड लेफ़्टिनेंट अरुण खेत्रपाल (अंग्रेज़ी: Second Lieutenant Arun Khetarpal, जन्म: 14 अक्तूबर, 1950 – शहादत: 16 दिसम्बर, 1971) परमवीर चक्र से सम्मानित भारतीय थे। उन्हें यह सम्मान सन 1971 में मरणोपरांत मिला। 1971 में हुआ भारत-पाकिस्तान युद्ध, जिसमें बांग्लादेश पाकिस्तान से छूटकर एक स्वतंत्र देश की तरह जन्मा, भारत के इतिहास में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यह युद्ध 17 दिसम्बर, 1971 तक चला। इसमें पाकिस्तान ने मुहँ की खाई। वह न केवल हार गया, बल्कि उससे टूट कर उसका राज्य पूर्वी पाकिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में जन्मा, जो बांग्लादेश कहलाया। इस युद्ध में अनेक वीरों ने अपने प्राणों की कुर्बानी दी। सेकेंड लेफ़्टिनेंट अरुण खेत्रपाल उन्हीं में से एक हैं।

जीवन परिचय

अरुण खेत्रपाल का जन्म जन्म 14 अक्तूबर, 1950 में पूना में हुआ। उनकी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा उन अलग-अलग जगहों के स्कूलों में हुई, जहाँ उनके पिता भेजे गए, लेकिन स्कूली शिक्षा के अंतिम पाँच महत्त्वपूर्ण वर्ष अरुण ने लारेंस स्कूल सनावर में गुजारे। वह जितना पढ़ाई-लिखाई में निपुण थे उतना ही उनका रंग खेल के मैदान में भी जमता था। वह स्कूल के एक बेहतर क्रिकेट खिलाड़ी थे। एन.डी.ए. (NDA) के दौरान वह 'स्क्वेड्रन कैडेट' के रूप में चुने गए। इण्डियन मिलिट्री अकेडमी देहरादून में वह सीनियर अण्डर ऑफिसर बनाए। 13 जून, 1971 को वह बाकायदा पूना हॉर्स में बतौर सेकेंड लेफ्टिनेंट शामिल हुए। उन्होंने कभी किसी भी काम को बेमन से नहीं किया। मना तो किसी काम को कभी किया ही नहीं। यह उनकी तारीफ मानी जाती थी कि वह हर काम करने को खुशी-खुशी तैयार रहते थे और अपने काम के माहौल को बनाए रखते थे।

परिवार

अरुण खेत्रपाल जिस परिवार में जन्मे उसमें फौजी जीवन के संस्कार कई पीढ़ियों से चले आ रहे थे। अरुण के परदादा सिख सेना में कार्यरत थे और 1848 में उन्होंने ब्रिटिश सेना के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी थी। उनका मोर्चा चिलियाँवाला में हुआ था। अरुण के दादा जी पहले विश्व युद्ध के सैनिक थे तथा 1917 से 1919 तक उन्होंने इसमें हिस्सा लिया था। अरुण खेत्रपाल के पिता जी मदन लाल खेत्रपाल ब्रिगेडियर तो हुए ही उन्होंने अतिविशिष्ट सेना मेडल (AVSM) भी प्राप्त किया। जाहिर है इस परम्परा को आगे वढ़ाने वाले सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल इस दिशा में अपना कद अपने पूर्वजों से बड़ा ही स्थापित करते।

बहादुर और अनुशासन प्रिय

अरुण खेत्रपाल के लिए बहादुरी और अनुशासन दोनों एक ही शब्द के पर्यायवाची जैसे रहे। जब वह इण्डियन मिलिट्री अकादमी में सीनियर अण्डर ऑफिसर थे, तब एक बहुत ख़ास मौका ऐसा आया, जहाँ इनका यह गुण स्पष्ट रूप से मुखर हुआ। उन्हें दो आदेश एक साथ मिले। एक आदेश ने उन्हें 11 बजे दिन में लाइब्रेरी की एक मीटिंग में भाग लेने को कहा। उसी दिन दूसरा आदेश उन्हें ठीक उसी समय, यानी 11 बजे फायरिंग रेंज में भेज रहा था। जाहिर है कि एक साथ एक ही समय दो स्थानों पर नहीं रह सकते। लेकिन इस विरोधाभासी आदेशों पर सवाल उठाना उनकी प्रकृति में नहीं था। उन्होंने फायरिंग रेंज में जाना स्वीकार किया और वहाँ ठीक समय पर पहुँचकर अपना फर्ज पूरा किया। लाइब्रेरी की मीटिंग में न पहुँचने के कारण दण्ड स्वरूप उन्हें सेनियर अण्डर ऑफिसर से एक पद नीचे उतार दिया गया। उन्होंने यह दण्ड बिना बहस स्वीकार कर लिया। इस पर कोई शोर नहीं मचाया। उन्हें बाद में फिर सीनियर अण्डर ऑफिसर बनाया गया, लेकिन दण्ड भुगतने पर उन्होंने चूँ तक नहीं की, शिकायत तो दूर की बात है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  • पुस्तक- परमवीर चक्र विजेता | लेखक- अशोक गुप्ता | पृष्ठ संख्या- 96

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