अंकुश कृमि  

अंकुश कृमि (अंग्रेज़ी में 'हुकवर्म') बेलनाकार छोटे-छोटे भूरे रंग के कृमि होते हैं। ये अधिकतर मनुष्य की क्षुद्र आंत्र के पहले भाग में रहते हैं। इनके मुँह के पास एक कँटिया-सा अवयव होता है; इसी कारण ये अंकुश कृमि कहलाते हैं। इनकी दो जातियाँ होती हैं, 'नेकटर अमेरिकानस' और 'एन्क्लोस्टोम डुओडिनेल'। ये दोनों ही प्रकार के कृमि सब जगह पाए जाते हैं। नाप में मादा कृमि 10 से लेकर 13 मिलीमीटर तक लंबी और लगभग 0.6 मिलीमीटर व्यास की होती है। नर थोड़ा छोटा और पतला होता है।

मानव शरीर में प्रवेश

मनुष्य के आंत्र में पड़ी मादा कृमि अंडे देती हैं, जो बिष्ठा (मल) के साथ बाहर निकलते हैं। भूमि पर बिष्ठा में पड़े हुए अंडे ढोलों (लार्वा) में परिणत हो जाते हैं, जो केंचुल बदलकर छोटे-छोटे कीड़े बन जाते हैं। किसी व्यक्ति का पैर पड़ते ही ये कीड़े उसके पैर की अंगुलियों के बीच की नरम त्वचा को या बाल के सूक्ष्म छिद्र को छेदकर शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। वहाँ रुधिर या लसीका की धारा में पड़कर वे हृदय, फेफड़े और वायु प्रणाली में पहुँचते हैं और फिर ग्रास नलिका तथा आमाशय में होकर अँतरियों में पहुँच जाते हैं।

रोगजनक

गंदा जल पीने अथवा संक्रमित भोजन करने से भी ये कृमि आंत्र में पहुँच जाते हैं। वहाँ पर तीन या चार सप्ताह के पश्चात्‌ मादा अंडे देने लगती है। इस प्रकार मानव शरीर में इस कृमि की संख्या लगातार बढ़ती रहती है और मानव शरीर रोगग्रस्त हो जाता है। ये कृमि अपने अंकुश से आंत्र की भित्ति पर अटके रहते हैं और रक्त चूसकर अपना भोजन प्राप्त करते हैं। ये कई महीने तक जीवित रह सकते हैं। परंतु साधारणत: एक व्यक्ति में बार-बार नए कृमियों का प्रवेश होता रहता है और इस प्रकार कृमियों का जीवन चक्र और व्यक्ति का रोग दोनों ही चलते रहते हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अंकुश कृमि (हिंदी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 28 जनवरी, 2014।

संबंधित लेख

और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=अंकुश_कृमि&oldid=609996" से लिया गया