अँधेरे बंद कमरे -मोहन राकेश  

अँधेरे बंद कमरे -मोहन राकेश
'अँधेरे बंद कमरे' उपन्यास का आवरण पृष्ठ
लेखक मोहन राकेश
मूल शीर्षक अँधेरे बंद कमरे
प्रकाशक राजकमल प्रकाशन
प्रकाशन तिथि 1 जनवरी, 2003
ISBN 81-267-0074-2
देश भारत
पृष्ठ: 330
भाषा हिन्दी
प्रकार उपन्यास

अँधेरे बंद कमरे प्रसिद्ध साहित्यकार, उपन्यासकार और नाटककार मोहन राकेश द्वारा रचित उपन्यास है। इसका प्रकाशन 1 जनवरी, 2003 को 'राजकमल प्रकाशन' द्वारा हुआ था।

वर्तमान भारतीय समाज का अभिजातवर्गीय नागर मन दो हिस्सों में विभाजित है- एक में है पश्चिमी आधुनिकतावाद और दूसरे में वंशानुगत संस्कारवाद। इससे इस वर्ग के भीतर जो द्वंद्व पैदा होता है, उससे पूर्वता के बीच रिक्तता, स्वच्छंदता के बीच अवरोध और प्रकाश के बीच अंधकार आ खड़ा होता है। परिणामत: व्यक्ति ऊबने लगता है, भीतर-ही-भीतर क्रोध, ईर्ष्या और संदेह उसे जकड़ लेते हैं, जैसे वह अपने ही लिए अजनबी हो। वह उठता है, और तब इसे हम हरबंस की शक्ल में पहचानते हैं। हरबंस इस उपन्यास का केन्द्रीय पात्र है, जो दाम्पत्य संबंधों की तलाश में भटक रहा है। हरबंस और नीलिमा के माध्यम से पारस्परिक ईमानदारी, भावनात्मक लगाव और मानसिक समदृष्टि से रिक्त दांपत्य जीवन का इस उपन्यास में प्रभावशाली चित्रण हुआ है। अपनी पहचान के लिए पहचानहीन होते जा रहे भारतीय अभिजातवर्ग की भौतिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक महत्त्वाकांक्षाओं के अँधेरे बंद कमरों को खोलने वाला यह उपन्यास हिन्दी की गिनी-चुनी कथाकृतियों में से एक है।

कथासार

मधुसूदन एक पत्रकार है, जो दिल्ली आकर कस्‍साबपुरा में एक ठकुराइन के यहाँ बसता है। कस्‍साबपुरा में निम्‍न सामाजिक स्थिति के लोग रहते हैं। मधुसूदन और ठकुराइन के बीच रस रंग की बातें भी होती रहती हैं। मधुसूदन उस गंदे और घुटन भरे वातावरण से निकलकर कनाट प्‍लेस की चहल पहल में रहना चाहता है। एक दिन अचानक उसकी भेंट हरबंस से हो जाती है, जिससे उनका परिचय बम्बई में हुआ था। मधुसूदन का परिचय, हरबंल की पत्‍नी नीलिमा और उसकी सालियाँ शुक्‍ला और सरोज से हो जाता है। हरबंस उखड़ा-उखड़ा सा रहता है। वह एक कॉलेज में अस्‍थायी रुप से पढ़ाता है, साहित्‍यकार बनने की धुन भी लगी रहती है। भारतीय इतिहास पर काम भी करता है। नीलिमा को चित्रकला में शौक़ था, किन्तु धीरे-धीरे नृत्य कला की ओर उसका झुकाव हो जाता है। दिल्‍ली से भागकर हरबंस लन्दन चला जाता है और वहाँ पहुँचकर नीलिमा को आमंत्रि‍त करता है। लन्‍दन पहुँचकर नीलिमा बेबी सिटिंग से तंग आकर उमादत्‍त-ट्रप के साथ पेरिस चली जाती है। ट्रप लौट आता है और नीलिमा ऊ बानू नामक एक बर्मी कलाकार के साथ दो दिन पेरिस में रुककर पुनः लन्‍दन लौट आती है। हरबंस दिल्‍ली लौटकर अन्‍तर्राष्‍ट्रीय राजनीति, कला और सभ्‍यता के झूठे नकाब में अपने विजन को विस्‍थापित करता है। नीलिमा के असफल नृत्‍य प्रदर्शन पर प्रशंसापूर्ण टिप्‍पणियाँ छपती हैं। हरबंस उसके साथ सहयोग नहीं करता है। नीलिमा हरबंस को छोड़कर चली जाती है। हरबंस रात भर छटपटाता है और मधुसूदन रात भर उसके साथ रहता है। सवेरा होने पर दरवाज़ा खोलते ही वह नीलिमा को चाय बनाते देखता है। मधुसूदन ने आत्‍मकथा के रुप में ठकुराइन, हरबंस और नीलिमा, अपनी और सुषमा श्रीवास्‍तव की कहानी कही है।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 अँधेरे बंद कमरे (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 02 जनवरी, 2013।

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