हिन्दी का अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य -बच्चूप्रसाद सिंह  

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लेखक- श्री बच्चूप्रसाद सिंह

          हिन्दी संसार की श्रेष्ठ और समृद्ध भाषा है; इसके बारे में अब कहीं कोई विवाद नहीं रहा और इसे सिद्ध करने में कुछ अंश तक दो विश्व हिन्दी सम्मेलनों का योगदान अविस्मरणीय है। भारत के बाहर लगभग 100 विश्वविद्यालयों में हिन्दी का पठन-पाठन हो तथा विकसित तथा विकासशील देशों में इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती जाए, यह भी इस बात का प्रमाण है कि हिन्दी का परिवार बृहत और व्यापक बनता जा रहा है। मेरी यह धारणा है कि तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजन से विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार का मार्ग निश्चय ही प्रशस्त होगा एवं इस सम्मेलन के अवसर पर आयोजित अनेक संगोष्ठियों में जो चर्चाएँ होंगी उनसे हमारे देश के विद्वानों को विदेशों में हिन्दी के बारे में उपयोगी सूचनाएँ मिलेंगी तथा संसार भर में फैले हुए हिन्दी प्रेमियों के मध्य विचारों के आदान-प्रदान से पारस्परिक सद्भाव बढ़ेगा। देश की आजादी के बाद विदेशों के साथ हमारे राजनयिक और सांस्कृतिक संबंध अधिक सुदृढ़ हुए हैं और इस क्षेत्र में बहुत हद तक हिन्दी का भी योगदान रहा है। आज इस बात की सूचना पूरे प्रबुद्ध वर्ग को है कि हिन्दी मात्र भारत में ही नहीं, संसार के अनेक देशों में बड़ी लोकप्रिय है। प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने नागपुर में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा था कि हिन्दी संसार की महान् भाषाओं में एक है और आज इसे देश और विदेश में करोड़ों लोग जानते हैं।
          आज से प्राय: बारह-तेरह वर्ष पूर्व जब भारत की संसद में यह चर्चा हुई कि भारत के बाहर लगभग 100 ऐसे विश्वविद्यालय हैं जहाँ हिन्दी के पठन-पाठन की समुचित व्यवस्था है तो सभी को सुखद आश्चर्य हुआ। ये विश्वविद्यालय यूरोप, अमरीका, एशिया, आस्ट्रेलिया, और अफ्रीका में हैं तथा उन देशों में हिन्दी तो विद्यमान है ही जहाँ भारतवंशियों की संख्या पर्याप्त है। इसी पृष्ठभूमि के साथ नागपुर में 1975 के जनवरी माह में प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन में संसार के 30 देशों से अनेक विद्वान एवं प्राध्यापक आये तथा मारीशस का एक राजकीय प्रतिनिधिमंडल वहाँ के प्रधानमंत्री श्री शिव सागर रामगुलाम के नेतृत्व में भाग लेने आया। श्री शिवसागर रामगुलाम ने अपने भाषण में हिन्दी के संबंध में कहा कि हिन्दी की लोकप्रियता भारत में तो है ही लेकिन हमारे लिए इस भाषा की एक ख़ास विशेषता है। हमें अनेक एशियाई-अफ्रीकी देश इस भाषा को एक अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करते हैं।
          सभी ने नागपुर सम्मेलन में यह देखा कि यूरोप, अमरीका, कनाडा, एशिया, आस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के अनेक देशों से आये लोग किस प्रकार धारा-प्रवाह हिन्दी में भाषण कर रहे थे। विदेशियों को भी इस बात की प्रसन्नता थी कि अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर वे अपने विचारों का आदान-प्रदान इस भाषा के माध्यम से कुशलतापूर्वक कर रहे थे। इस सम्मेलन ने हिन्दी के प्रति जो कुछ शंकाएँ लोगों के मन में थीं, उन्हें दूर किया और पहली बार उसी मंच से यह सिद्ध हुआ कि अन्तर्राष्ट्रीय धरातल पर पारस्परिक आदान-प्रदान के लिए हिन्दी एक सर्वथा सशक्त एवं सक्षम भाषा है। उस सम्मेलन से हिन्दी की गौरववृद्धि के साथ-साथ एक विश्व हिन्दी परिवार की कल्पना साकार हुई और पहली बार एक विपुल जन-समुदाय ने यह महसूस किया कि हिन्दी के विकास तथा प्रचार की संभावनाएँ अपार हैं।
          विश्व हिन्दी सम्मेलन, नागपुर में यह स्पष्ट दिखाई पड़ा कि हिन्दी के साथ संसार के अनेक देशों में जो लोग जुड़े हैं उनकी दो श्रेणियाँ हैं – एक हैं भारतवंशी जो भावनात्मक स्तर पर इस भाषा के साथ सदियों से जुड़े हुए हैं और दूसरी श्रेणी में वे लोग हैं जो इस भाषा का अध्ययन-अध्यापन शुद्ध भाषायी एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से करते हैं। मारीशस, फीजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद, जमैका, मलयेशिया, कीनिया, थाईलैण्ड, बर्मा, नेपाल तथा अनेक ऐसे देश जहाँ भारतवंशियों की संख्या पर्याप्त है और उनके बीच हिन्दी के लोकप्रिय होने का एक बड़ा कारण है कि वे या उनके पूर्वज भारत से गये थे और भारत के प्रति उनका आकर्षण सर्वथा स्वाभाविक है। यह बात सर्वथा स्पष्ट है कि वे जो भारत के इतिहास, भारत की संस्कृति, सभ्यता, भारत की विरासत, भारत की विचार-धारा और इस देश के गौरवपूर्ण इतिहास तथा विशाल संभावनाओं से युक्त एशिया के इस महत्वपूर्ण भू-भाग को भली-भाँति जानना और समझना चाहते हैं, उन्हें भारत की एक प्रमुख भाषा के ज्ञान की आवश्यकता नितान्त महसूस होती है और इस दृष्टि से ही भारतवंशी बहुल देशों के अतिरिक्त अमरीका, कनाडा, रूस, पोलैण्ड, चेकोस्लोवाकिया, हालैण्ड तथा पश्चिमी यूरोप के अनेक देश जैसे यू.के., फ्रांस, इटली आदि में हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था विश्वविद्यालय तथा समकक्ष सुप्रसिद्ध संस्थाओं में अद्यतन एवं आधुनिक ढंग से किया गया है। इन देशों का एक बहुत बड़ा समुदाय कई दशकों से हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन, लेखन और प्रकाशन के द्वारा इस भाषा के प्रति अपनी अटूट निष्ठा का प्रमाण हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। आज यदि हम यूरोप के देशों की ओर ध्यान दें तो यह हमारे लिए कुछ आश्चर्यजनक लगता है कि हिन्दी में गहनतम विषयों, उसके भाषायी और साहित्यिक पक्ष पर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में शोध कार्य अबाध-गति से चल रहा है। यार्क और लन्दन विश्वविद्यालयों में अनेक लोग हिन्दी भाषा और साहित्य के मनोयोग पूर्वक अध्ययन कर रहे हैं। फ्रांस में हिन्दी के अध्यापन की समुचित व्यवस्था है और पश्चिमी जर्मनी तथा पूर्वी जर्मनी दोनों में सुयोग्य प्राध्यापकों के सान्निध्य में अनेक लोग इस भाषा के विभिन्न पक्षों से दिनोंदिन सुपरिचित होते जा रहे हैं। भाषा के अध्ययन-अध्यापन के अतिरिक्त अनेक देशों में जनसंचार के क्षेत्र में हिन्दी का प्रयोग हो रहा है। लन्दन से ही दो साप्ताहिक समाचार-पत्र अनेक वर्षों से प्रकाशित हो रहे हैं और उनका भी एक पाठय समुदाय है। आज यू.के. के अनेक हिस्सों में बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं, और लन्दन को तो एक हिस्सा ही जैसे भारतीय बहुल भू-खण्ड हो गया है। भारतीय बच्चों को मातृभाषा के भाषा के माध्यम से पढ़ाने की सुविधा प्रदान की जाए, इस ओर यू.के. सरकार का शिक्षा विभाग सचेष्ट है और मुझे यह स्वयं देखने का अवसर मिला कि राष्ट्रमण्डल सचिवालय भी इस विषय में रुचि ले रहा है। लन्दन और बर्मिंघम के इलाकों में बच्चों को हिन्दी एवं भारतीय भाषा सिखाने की समुचित व्यवस्था के लिए सभी प्रकार के प्रयास किये जा रहे हैं।
          मुझे कई बार संसार के अनेक विश्वविद्यालयों में जाने का सौभाग्य और सुवअवसर प्राप्त हुआ है। मुझे आज भी याद है कि कैम्ब्रिज के प्रोफेसर मैग्रेगर ने किस आत्मीयता के साथ मुझे अपने विश्वविद्यालय का पुस्तकालय आज से अनेक वर्ष पूर्व दिखाया था और उन्होंने यह कहा था कि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में हिन्दी की कई हस्ललिखित पुस्तकें उपलब्ध हैं, जिनके आधार पर हिन्दी साहित्य के इतिहास में कुछ नई बातें जोड़ी जा सकती हैं। संसार के इन हिन्दी प्रेमी विद्वानों से मिलकर मुझे ऐसा लगा कि हमारी भाषा और हमारे हिन्दी साहित्य के लिए इन विद्वानों का योगदान एक दिन निश्चय ही अद्भुत सिद्ध होगा। जो लोग साहित्य के क्षेत्र में दिन-प्रतिदिन होने वाले अनुसंधान, अनुशीलन की ओर निगाह रखते हैं, उन्हें इस बात का ज्ञान है कि भारत के बाहर अनेक विद्वान हमारी भाषा के विभिन्न पक्षों पर बड़ी सक्षमता के साथ विशेष अध्ययन कर रहे हैं, और उनके अनुशीलन का परिणाम हमारे साहित्य को एक नया आयाम दे सकेगा।
          बी.बी.सी. की हिन्दी सेवा के बारे में कुछ अधिक कहने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि उनके हिन्दी कार्यक्रम वर्षों से लगातार चले आ रहे हैं और संसार के अनेक देशों में हिन्दी प्रेमी लोग इस कार्यक्रम को ध्यानपूर्वक सुनते हैं। आज बी.बी.सी. के हिन्दी एकक ने संसार के सुप्रसिद्ध प्रचार माध्यमों के बीच अपना एक सम्मानपूर्वक स्थान बना लिया है और उनकी कुशलता की सराहना अनेक लोग किया करते हैं।
          सोवियत संघ के अनेक प्राध्यापक, पत्रकार एवं साहित्य सेवी हिन्दी की श्रीवृद्धि में अनेक वर्षों से लगे हैं। अनुवाद के माध्यम से हिन्दी को सोवियत संघ में लोकप्रिय बनाने में इन विद्वानों का योगदान अविस्मरणीय है। बारान्निकोव से लेकर प्रो. चेलिशेव, प्रो. दिम्शित्ज़ और अन्य अनेक सुविज्ञ विद्वानों के नाम से हिन्दी के पाठक सुपरिचित है। रूस के विद्वानों के योगदान की चर्चा किसी एक निबन्ध के कलेवर में कदापि नहीं समा सकती, क्योंकि हमारे देश के चैतन्य पाठक यह भली प्रकार जानते हैं कि रूसी विद्वानों ने रामायण से लेकर हमारे देश के अनेक आधुनिक कवियों और लेखकों की रचनाओं का रूसी में अनुवाद किया है और हिन्दी के अनेक साहित्यिक अनुष्ठानों का उन्होंने रूस की धरती पर उल्लासपूर्वक आयोजन किया है तथा हमारे मनीषियों और लेखकों के प्रति रचनात्मक ढंग से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। अभी प्रेमचन्द शताब्दी के अवसर पर रूस में कई रचनाएँ प्रकाशित हुईं।
          यूरोप के विद्वानों के सन्दर्भ में प्रो. लोठार लुत्से, प्रो. गात्स्लाफ, हालैण्ड के प्रो. शोकर, डेनमार्क के प्रो. थीसन, पोलैण्ड के ब्रिस्की, इटली के प्रो. तुर्बियानी, फ्रांस की प्रो. निकोल बलबीर, हंगरी की प्रो. इवा अरादी और रूस की साजानोवा, चेकोस्लोवाकिया के प्रो. स्मैकल आदि अन्य अनेक विद्वानों के नाम हिन्दी के पाठकों के लिए सर्वथा सुपरिचित है। इन विद्वानों में अपने-अपने ढंग से हिन्दी की सेवा की है और वे इस दिशा में सतत प्रयत्नशील हैं। अब तक आयोजित नागपुर तथा मारीशस के विश्व हिन्दी सम्मेलनों ने इन विद्वानों को हमारे देश के हिन्दी प्रेमियों के समीप ला दिया है और आज यूरोप तथा अन्य देशों के कई विद्वानों की रचनाएँ भारत में छपती, बिकती तथा पढ़ी जाती है।
          यूरोप के अतिरिक्त अमरीका में भी आज कई दर्जन ऐसे विश्वविद्यालय है जहाँ हिन्दी का समुचित पठन-पाठन हो रहा है। प्रसन्नता की बात तो यह है कि हिन्दी की आधुनिक रचनाएँ भी उनके पास उपलब्ध है। अमरीका की कांग्रेस लाइब्रेरी के माध्यम से भारत में छपने वाली प्राय: हिन्दी की सभी रचनाएँ प्रमुख विश्वविद्यालयों को सहज ही सुलभ हो जाती है। संसार के इन विश्वविद्यालयों में हिन्दी के अतिरिक्त भारत की कई अन्य भाषाओं का भी अध्ययन-अध्यापन होता है। तमिल, बंगला, तेलुगु, उर्दू, मराठी आदि भाषाओं के अध्यापन की भी वहां समुचित व्यवस्था है।
          हिन्दी की लोकप्रियता का एक सबल पक्ष प्रस्तुत करते हैं – मारीशस, फीजी और सूरीनाम जैसे देश, जहाँ हिन्दी आज भी लोकप्रिय है। इन देशों से हिन्दी की अनेक पुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती है। फीजी के संविधान में तो संसद में हिन्दी के प्रयोग का भी प्रावधान किया गया है और मारीशस के लोग तो हिन्दी को अपने जीवन का अविच्छिन्न अंग मानते हैं। यही कारण है कि आज मारीशस के सर्वश्री अभिमन्यु अनत सोमदत्त बखौरी और दूसरे लेखक, कवि, कथाकार अत्यन्त लोकप्रिय है और उनकी रचनाएँ हमारे देश की पत्र-पत्रिकाओं में बराबर छपती है। मुझे याद है कि आज से लगभग एक दशक पूर्व जब मारीशस के लेखक हिन्दी में अपनी पहचान बनाने को आतुर एवं उत्सुक थे तो कई लोगों को यह कुछ असम्भव सा प्रतीत दिखाई पड़ता था लेकिन आज अपनी सृजन शक्ति के बल पर मारीशस के लेखकों ने हिन्दी के पाठकों के बीच अपना एक सम्मानपूर्ण स्थान बना लिया है और मुझे मालूम है कि मारीशस के लेखक और कवि हिन्दी के शुभचिन्तकों से यह मांग करते हैं कि हिन्दी साहित्य के इतिहास में इन लोगों के लिए भी स्थान सुरक्षित किया जाए जो भारत के बाहर रहकर हिन्दी की सेवा एवं श्रीवृद्धि कर रहे हैं। इस सन्दर्भ में फीजी के पंडित कमला प्रसाद मिश्र जैसे समर्पित कवि और लेखक का स्मरण हो आता है जिन्होंने अपने देश में अपनी लेखनी के बल पर हिन्दी पत्रकारिता एवं साहित्य का एक उच्च मानदण्ड स्थापित किया है।
          फीजी के ही डॉ. विवेकानन्द शर्मा, श्री जे.एस. कवल, श्री बलराम वशिष्ठ जैसे अनेक लोगों ने अपनी रचनाओं के बल पर हिन्दी के भण्डार को समृद्ध किया है। फीजी के पास ही आस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा के राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में प्रो. बार्ज जैसे विद्वान अत्यन्त परिश्रमपूर्वक हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन में लगे हैं और उनकी साधना हिन्दी को एक नया स्वरूप प्रदान कर रही है। मुझे कैनबरा में यह देखकर आश्चर्य हुआ कि प्रो. बार्ज कितनी कठिनाई के साथ अपने छात्रों को हिन्दी की क्रिया की विशेषताएँ समझाने में तल्लीन थे और मुझे आभास हुआ कि विदेशों में दूसरे देश की भाषा सिखाने में कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
          आस्ट्रेलिया के बाद यदि हम एशियाई देशों की ओर ध्यान दें तो इस सन्दर्भ में जापान के प्रो. के. दोई की सेवाओं को कदापि भुलाया नहीं जा सकता। उनकी सेवाओं के प्रति समस्त जापान के हिन्दी-प्रेमी समुदाय नतमस्तक हैं और उन्होंने अपनी निरन्तर साधना के बल पर जापान के सैंकड़ों विद्यार्थियों को हिन्दी के अध्ययन के लिए प्रेरित किया। हमें दु:ख है कि वे अब इस संसार में नहीं रहे। इस प्रकार आज प्रो. मिजोकामी, प्रो. कोगा और प्रो. सुजुकी जैसे लोग अपने अध्यावसाय के बल पर पत्र-पत्रिकाएँ निकालकर जापान और भारत के बीच सांस्कृतिक धरातल पर एक सेतु निर्माण का कार्य कर रहे हैं। इन सभी के पीछे प्रो. दोई को ही प्रेरणा का स्रोत मानना पड़ेगा। जीवन के अन्तिम दिनों तक वे विश्व हिन्दी परिवार के साथ संबद्ध रहे और संसार के अन्य हिन्दी प्रेमियों के साथ उनका बड़ा ही स्नेहपूर्ण संबंध था।
          एशियाई देशों के ही सन्दर्भ में हम अपने पड़ोसी देशों के हिन्दी प्रेम को भुला नहीं सकते। बंगलादेश में प्रो. अहसान और तालुकदार जैसे लोग हिन्दी की सेवा वर्षों से करते रहे हैं। श्रीलंका के कलानिया विश्वविद्यालय में हिन्दी का एक विभाग है। पाकिस्तान में अनेक हिन्दी-प्रेमी हैं जिनमें से कुछ तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में पधारने वाले हैं। अपने प्रतिवेदी देशों में भी हिन्दी का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। नेपाल की भाषा नेपाली है जो भाषायी दृष्टि से हिन्दी के बहुत समीप है और नेपाल में अनेक लेखक एवं पत्रकार निरन्तर हिन्दी की सेवा कर रहे हैं। इन कवियों और लेखकों की रचनाओं से हमारे पाठक सर्वथा अभिज्ञ हैं। हिन्दी के प्रचार-प्रसार की दिशा में चीन की सेवा को भुलाया नहीं जा सकता। आज चीन में अनेक ऐसे मौन साधक हैं जो हिन्दी की सेवा कर रहे हैं। चीन के विश्वविद्यालयों तथा प्रसिद्ध शिक्षण संस्थाओं में हिन्दी अध्ययन-अध्यापन वर्षों से ही रहा है। चीन के प्रो. लयूकोनान की सेवाओं से अनेक लोग सुपरिचित हैं। उन्होंने भारत के विभिन्न प्रदेशों के इतिहास पर कार्य किया है।
          भारत की अनेक प्रसिद्ध रचनाओं का भी उन्होंने अनुवाद किया है। चीन के ही चिन तिंग हान की सेवा से हम सुपरिचित हैं। उन्होंने पेकिंग विश्वविद्यालय के साहित्य विभाग को अपनी सेवाएँ समर्पित कीं और हिन्दी-चीनी शब्दकोश, हिन्दी-चीनी मुहावरा कोश की संरचना में सहयोग दिया तथा प्रेमचन्द के उपन्यास ‘निर्मला’ का चीनी भाषा में अनुवाद किया। इसी प्रकार थाईलैण्ड, मलयेशिया और सिंगापुर के अनेक हिन्दी प्रेमी इस ओर सर्वथा दत्तचित और सचेष्ट हैं कि हिन्दी के माध्यम से उनके देश को भारत की मनीषा का परिचय प्राप्त होता है। हिन्दी का यह आलोकपुंज भारत की चिरन्तन सत्य, निष्ठा, प्रेम और सहिष्णुता, विश्वशान्ति तथा सद्भाव का संदेश पूरे मानव समुदाय को देता रहे, यही तो हमारा अभीष्ट है ताकि तुमुल कोलाहल, कलह के बीच हृदय की बात न्यायोचित स्थान प्राप्त कर सके।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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