स्तूप  

बुद्ध स्तूप, सांची
Sanchi Stupa, Sanchi

स्तूप का शाब्दिक अर्थ है- 'किसी वस्तु का ढेर'। स्तूप का विकास ही संभवतः मिट्टी के ऐसे चबूतरे से हुआ, जिसका निर्माण मृतक की चिता के ऊपर अथवा मृतक की चुनी हुई अस्थियों के रखने के लिए किया जाता था। गौतम बुद्ध के जीवन की प्रमुख घटनाओं, जन्म, सम्बोधि, धर्मचक्र प्रवर्तन तथा निर्वाण से सम्बन्धित स्थानों पर भी स्तूपों का निर्माण हुआ। स्तूप के 4 भेद हैं-

  1. शारीरिक स्तूप
  2. पारिभोगिक स्तूप
  3. उद्देशिका स्तूप और
  4. पूजार्थक स्तूप
  • स्तूप एक गुम्दाकार भवन होता था, जो बुद्ध से संबंधित सामग्री या स्मारक के रूप में स्थापित किया जाता था।
  • सम्राट अशोक ने भी स्तंम्भ बनवाये थे। साँची का पता सन् 1818 ई. में 'जनरल टायलर' ने लगाया था।
  • विश्वप्रसिद्ध बौद्ध स्तूपों के लिए जाना जाने वाला साँची, विदिशा से 4 मील की दूरी पर 300 फीट ऊँची पहाड़ी पर है।
  • प्रज्ञातिष्य महानायक थैर्यन के अनुसार-यहाँ के बड़े स्तूप में स्वयं भगवान बुद्ध के तथा छोटे स्तूपों में भगवान बुद्ध के प्रिय शिष्य 'सारिपुत' (सारिपुत्र) तथा 'महामौद्गलायन' समेत कई अन्य बौद्ध भिक्षुओं के धातु रखे हैं। राजा तथा श्रद्धालु-जनता के सहयोग से यह निर्माण-कार्य हुआ।
स्तूप के प्रमुख अंग
वेदिका (रेलिंग) स्तूप की रक्षा के लिए
मेधि (कुर्सी) जिस पर स्तूप का मुख्य भाग आधारित होता है
अण्ड स्तूप का अर्द्ध-गोलाकार भाग
हर्मिका शिखर के अस्थि पात्र की रक्षा हेतु
छत्र अथवा छत्रावली धार्मिक चिह्न का प्रतीक
यष्टि छत्र को सहारा देने के लिए

प्राचीन काल के कुछ प्रमुख स्तूप स्थल निम्नलिखित हैं-

पिपरावा

कला तथा स्थापत्य के क्षेत्र में सर्वप्राचीन किन्तु काफ़ी बड़ी उपलब्धि का परिचायक बस्ती ज़िला उत्तर प्रदेश में स्थित यह स्तूप प्राड़् मौर्य युगीन है, जिसका व्यास 116 फुट और चैड़ाई 22 फुट है। खुदाई के दौरान इस स्तूप के अन्दर एक मंजूषा में बुद्ध के अवशेष रखे पाए गए हैं।

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