साड़ी  

साड़ी में महिलायें

साड़ी भारतीय उपमहाद्वीप में स्त्रियों का प्रमुख बाह्य पहनावा है। भारत में साड़ी प्राचीन समय से ही स्त्रियों द्वारा पसन्द की जाती रही है। यह हमेशा अपनी विरासत को साथ लेकर चलती है। साड़ी किसी भी नारी की सादगी और शालीनता की परीचायक होती है। साड़ियों में जो कसीदाकारी की जाती है, उसका अपना एक इतिहास है। यह इतिहास 3,500 साल पुराना है। गाँव के गाँव पीढ़ियों से इस काम में जुटे हैं। एक-एक साड़ी को बनाने में बहुत वक्त लगता है। काम करने की बुनकरों की अपनी एक शैली है और उसी शैली के तहत डिज़ाइन बनाई जाती हैं। जिन देशों में यह शैली पहुँची, वहाँ की कला में साम्यता दिखाई देने लगती है। भले ही इन साड़ियों को पहनने वाली स्त्रियाँ धर्म और आस्था पर अपनी अलग राय रखती हों, किंतु साड़ियों में उकेरी गई कला आस्था का प्रमाण अवश्य देती है।

इतिहास

यजुर्वेद में सबसे पहले साड़ी शब्द का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद की संहिता[1] के अनुसार यज्ञ या हवन के समय पत्नी को साड़ी पहनने का विधान है और विधान के क्रम से ही साड़ी जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बनती चली गई। यही वजह रही कि इसमें निरंतर कई प्रयोग हुए। पौराणिक ग्रंथ महाभारत में द्रौपदी के चीर हरण का प्रसंग है। जब क्रोध में आकर दुर्योधन ने द्यूत क्रीड़ा में द्रौपदी को जीतकर उसकी अस्मिता को सार्वजनिक रूप से चुनौती दी थी, तब भगवान श्रीकृष्ण ने साड़ी की लंबाई बढ़ाकर उसकी रक्षा की। इस कथा के माध्यम से यह संकेत जाता है कि साड़ी केवल पहनावा नहीं है, बल्कि यह आत्म कवच भी है।

दूसरी शताब्दी ई. पू. की मूर्तियों में पुरुषों और स्त्रियों के शरीर के ऊपरी भाग को अनावृत दर्शाया गया है। ये कमर के इर्द-गिर्द साड़ी इस प्रकार लपेटे हुए हैं कि पैरों के बीच सामने वाले भाग में चुन्नटें बन जाती हैं। इसमें 12वीं सदी तक कोई ख़ास परिवर्तन नहीं हुआ। भारत के उत्तरी और मध्य भाग को जीतने के बाद मुस्लिमों ने ज़ोर दिया कि शरीर को पूरी तरह से ढका जाए।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ऋग्वेद, 10.130.1

बाहरी कड़ियाँ

और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=साड़ी&oldid=604336" से लिया गया