सांख्य मीमांसा  

सांख्य प्रमाण मीमांसा

भारतीय दर्शन की एक सामान्य विशेषता है उसका मानव केन्द्रित होना। सांख्य दर्शन भी मानव केन्द्रित है। तत्त्व गणना या विवेचना साध्य नहीं है। यह साधन है मानव के अन्तर्निहित और स्पष्ट उद्देश्य की प्राप्ति का। उद्देश्य संसार के दु:खों से स्वयं को मुक्त करने की मानवी प्रवृत्ति ही रही है। अत: तदनुरूप ही सांख्याचार्यों ने उन विषयों की विवेचना को अधिक महत्त्व दिया, जिनसे उनके अनुसार उद्देश्य की प्राप्ति हो सके। मानव मात्र दु:ख से निवृत्ति चाहता है। संसार में दु:ख है- इस ज्ञान के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, दु:ख से मुक्ति हेतु प्रवृत्ति भी प्रमाणापेक्षी नहीं है। दु:खनिवृत्ति के मानवकृत सामान्य प्रयासों से तात्कालिक निवृत्ति तो होती है लेकिन ऐकान्तिक और आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं होता। दु:ख क्यों होता है, कैसे उत्पन्न होता है, मानव दु:ख से क्यों मुक्त होना चाहता है- आदि प्रश्न गंभीर चिन्तनापेक्षी और उत्तरापेक्षी हे। यह चिन्तन और तदनुसार उत्तर ही दु:ख निवृत्ति में साधक हो सकते हैं। यह क्षेत्र ही 'ज्ञान' का है। अत: सांख्याचार्य अपनी दार्शनिक विवेचना का आरंभ ही दु:ख-विवेचना से करते हैं।

  • अथ त्रिविधदु:खात्यन्तिकनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थ:[1]
  • दु:खत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदभिघातके हेतौ॥[2]
  • दु:खनिवृत्ति की जिज्ञासा ज्ञाता-जिज्ञासु की अभीप्सा है कुछ जानने की। लेकिन कुछ जाना जा सकता है, जाना गया कुछ सत्य है, प्रामाणिक है- ऐसा मानने के लिए ज्ञान की सीमा और ज्ञान की साधनभूत कसौटियों का निर्धारण आवश्यक है। यही प्रमाण मीमांसा का क्षेत्र है।

सांख्य दर्शन की प्रमाण-मीमांसा

द्वयोरेकतरस्य वाप्यसन्निकृष्टार्थपरिच्छित्ति: प्रमा
तत्साधकतमं यत्तत् त्रिविधं प्रमाणम्॥[3]

बुद्धि और पुरुष दोनों में से एक का पूर्व से अनधिगत अर्थ का अवधारण प्रमा है और उस प्रमा (यथार्थ ज्ञान) का जो अतिशय साधक (करण) है; उसे प्रमाण कहते हैं। प्रमा अर्थात ज्ञान की परिभाषा में अनधिगत और अवधारण दो महत्त्वपूर्ण शर्ते हैं। यथार्थ ज्ञान या प्रमा होने में। अनधिगत या जो पहले से ज्ञात नहीं है- उसे ही जाना जाता है। यदि पहले से ही ज्ञात हो तो उसकी स्मृति होगी यथार्थ ज्ञान नहीं। फिर अवधारणा अर्थात भली-भांति या निश्चयात्मक रूप से धारण करना भी एक शर्त है। अनिश्चित ज्ञान संशय रूप होगा। अत: परिच्छित्ति या अवधारणा प्रमा से संशय को पृथक् करता है। यथार्थ ज्ञान की परिभाषा में इसे बुद्धि और पुरुष दोनों में से 'एक' का भी कहा है। इसका आशय यह है कि ज्ञान बुद्धि को भी होता है पुरुष को भी। दोनों ही दशाओं में बुद्धि पुरुष संयोग अनिवार्य है। पुरुष शुद्ध चैतन्य है, असंग है। अत: विषय अवधारण तो बुद्धि में ही होता है। लेकिन पुरुष में उपचरित होता है। विचारणीय यह है कि बुद्धि तो अचेतन या जड़ है, उसे ज्ञान होता है, कहना भी संगत नहीं होगा। अत: ज्ञान तो पुरुष को ही होता है- ऐसा मानना होगा। फिर, समस्त विकार पुरुषार्थ हेतुक हैं। अत: बुद्धिवृत्ति भी साधन ही कही जाएगी पुरुषार्थ के लिए। सूत्रकार बुद्धि और पुरुष दोनों के 'ज्ञान' की संभावना को स्वीकार करते हैं। विज्ञान भिक्षु इस स्थिति को प्रमाता-साक्षी-भेद करके स्पष्ट करते हैं। उनके अनुसार पुरुष प्रमाता नहीं बल्कि प्रमा का साक्षी है। प्रमा चाहे बुद्धिनिष्ठ (बुद्धिवृत्ति) हो चाहे पुरुषनिष्ठ या पौरुषेयबोध या दोनों का हो, प्रमा का जो साधकतम करण होगा, उसे ही प्रमाण कहा जाएगा और यदि बुद्धिवृत्ति को प्रमा कहें तब इन्द्रिय सन्निकर्ष को प्रमाण कहा जाएगा।

  • तीन प्रकार के प्रमाण सांख्य को अभीष्ट है-
  1. प्रत्यक्ष प्रमाण,
  2. अनुमान प्रमाण तथा
  3. शब्द प्रमाण।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सांख्य सूत्र 1/9
  2. कारिका 1
  3. सांख्य सूत्र 1।87
  4. 1/89
  5. कारिका 5
  6. सांख्य सूत्र 1/108
  7. सांख्य कारिका 6
  8. सांख्य सूत्र 1/100
  9. सां.प्र.भा. 1/100 पर गजानन शास्त्री मुसलगांवकरकृत व्याख्या
  10. 5वीं कारिका पर तत्त्वकौमुदी
  11. सांख्य सूत्र 1/103
  12. वहीध् अदृष्टस्वलक्षणसामान्यविषयम्।
  13. रूपादिज्ञाने क्रियात्वेन करणत्वानुमानम् सां. प्र. भा. 1/103
  14. कारिका-9
  15. सांख्य सूत्र 1/102
  16. तत्त्वयाथार्थ्यदीपन सं.रा.शं. भट्टाचार्य, भारतीय विद्या प्रकाशन, वाराणसी 23
  17. कारिका 5 पर कौमुदी
  18. 6वीं कारिका पर ज्योतिष्मती टीका
  19. सांख्ययोग एपिस्टेमालाजी पृष्ठ-55
  20. सांख्य सूत्र 1/56
  21. सांख्य सूत्र 1/56 1/114
  22. सांख्य सूत्र 1/56 1/114, 1/115/18 साथ ही द्रष्टव्य कारिका-9
  23. सांख्य सूत्र 1/56 1/114, 1/115/18 साथ ही द्रष्टव्य कारिका-9 1/136
  24. सांख्य सूत्र 1/56 1/114, 1/115/18 साथ ही द्रष्टव्य कारिका-9 1/136
  25. सांख्य कारिका 1/56 1/114, 1/115/18,साथ ही द्रष्टव्य कारिका-9 1/136 10, 11
  26. द सांख्य सन्सप्ट आफ पर्सनालिटी-अभयकुमार मजूमदार
  27. सांख्यप्रज्ञा-बी. कामेश्वर राव
  28. सांख्य सूत्र 1/61
  29. सांख्य कारिका-3
  30. तत्त्वसमाससूत्र 1-3
  31. तत्त्वयाथार्थ्यदीपन/1
  32. सी.का-11
  33. सी. का.-11
  34. सांख्य सूत्र 1/130.32
  35. सांख्य सूत्र 1/127
  36. साथ ही द्रष्टव्य सांख्य सूत्र 2/27
  37. सां.का.-24
  38. सांख्य सूत्र 2/13
  39. सांख्य सूत्र 2/14
  40. सां. का. 23
  41. सां.सि. पृष्ठ-250
  42. शांति पर्व(अध्याय 249)(श्लोक सं. 23
  43. सांख्य सूत्र-2/16
  44. सांख्यदर्शनम्
  45. सांख्यदर्शनम्-25
  46. सां.का.-20
  47. सां.प्र.भा. 2/18
  48. सांख्य सूत्र,(2/17
  49. सां.का.-33
  50. सांख्य सूत्र-2/26, सां.का.-27
  51. सांख्य सूत्र 1/139
  52. तद्विपरीतस्तथा च पुमान् का-11
  53. सांख्य सूत्र 1/140-42
  54. सांख्य सूत्र 1/143-44
  55. सांख्य प्रज्ञा 17-19
  56. सांख्यदर्शनम् पृष्ठ -285
  57. सांख्याचार्या: बहूनि पुरुषानान्मत्वेन वदन्ति।
  58. सांख्य सूत्र 1/149
  59. त्रिगुणादिविर्यपाच्चैव, कारिका-18
  60. इसका समाधान विज्ञानभिक्षु ने इस प्रकार किया-जन्ममरणे चात्र नोत्पत्तिविनाशे .. संघातविशेषेण संयोगश्च वियोगश्च भोगतदभावनियमकाविति। सां. प्र. भा. 1/149
  61. सां. प्र. भा. 1/1
  62. माठर-1
  63. सर्वमेव दु:खं मानसम्
  64. कारिका-55
  65. सां.प्र.भा. 1/55
  66. सूत्र-21
  67. सां. का.-64
  68. माठर-62
  69. जयमंगला-62
  70. सां. का. -17
  71. सां.सू. 1/104
  72. सां.का.-55
  73. सां.सि. पृष्ठ 185-189
  74. सां.प्र.भा. उपोद्घात
  75. सां.प्र.भा. उपोद्घात 1/192
  76. सां. प्र. भा. 6/64
  77. सां.सि. पृष्ठ-53
  78. 61वीं कारिका पर माठरवृत्ति
  79. सां.द.ऐ.प. पृष्ठ 193
  80. सां. त. की हिन्दी व्याख्या में व्याख्याकार का निवेदन
  81. सां.सि. पृष्ठ-64
  82. सांख्य कन्सप्ट आफ पर्सनालिटी पृष्ठ 33-34
  83. सां.द.ऐ.प. पृष्ठ-31
  84. सांख्य सि.
  85. सांख्यदर्शनम् भाष्यप्रदीप
  86. आ. अ. पृष्ठ 162-63
  87. सां.प्र.भा. 1/163
  88. भाष्यप्रदीप 1/163
  89. भा.द.आ.अ. पृष्ठ-163
  90. भा.द.आ.अ. पृष्ठ-163
  91. कारिका 33
  92. वही- 1/12
  93. कठोपनिषद 1॥6। 17
  94. महाभारत वनपर्व 397/17
  95. 3/9
  96. सांख्यानामनियतपदार्थाम्युपगम इति मूढप्रलाप उपेक्षणीय:। सां.प्र.भा. 1/61
  97. सां. सू. 1/।45
  98. 5/85
  99. सा.प्र.भा. 1/61
  100. सां. द.इ. पृष्ठ 348-49
  101. सा.प्र.भा. 1/99
  102. सूत्र 1/104
  103. सां. प्र.भा. 1/92
  104. सूत्र 1/92
  105. आधुनिक काल में रचित अन्य कुछ रचनाओं के लिए द्रष्टव्य एन्सायक्लापीडिया आफ इण्डियन फिलासफी भाग-4

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