सांख्य दर्शन और महाभारत  

महाभारत के शांति पर्व में सांख्य दर्शन के विभिन्न रूपों का विस्तृत व स्पष्ट परिचय मिलता है। तत्त्व गणना का रूप यहाँ सांख्य शास्त्र के प्रचलित रूप में अनुकूल ही है। इसके अतिरिक्त सांख्य-परम्परा के अनेक प्राचीन आचार्यों तथा उनके उपदेशों का संकलन भी शांति पर्व में उपलब्ध है। जिस स्पष्टता के साथ सांख्य-महिमागान यहाँ किया गया है, उससे महाभारतकार के सांख्य के प्रति रुझान का संकेत मिलता है। पुराणों की ही तरह महाभारत में भी दर्शन के रूप में सांख्य को ही प्रस्तुत किया गया है। अत: यदि महाभारत के शांतिपर्व को हम सांख्य दर्शन का ही एक प्राचीन ग्रन्थ कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। महाभारत के शांति पर्व के अन्तर्गत सांख्य दर्शन के कुछ प्रसंगों पर विचार करने के उपरान्त हम उसमें प्रस्तुत सांख्य-दर्शन की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करेंगे।

  • अध्याय 300 शांति पर्व में युधिष्ठिर द्वारा सांख्य और योग में अन्तर पूछने पर भीष्म उत्तर देते हैं।

अनीश्वर: कथं मुच्येदित्येवं शत्रुकर्षन।
वदन्ति कारणै: श्रैष्ठ्यं योगा: सम्यक् मनीषिण:॥3॥

वदन्ति कारणं चेदं सांख्या: सम्यग्विजातय:।
विज्ञायेह गती: सर्वा विरक्तो विषयेषु य: ॥4॥

ऊर्ध्वं स देहात् सुव्यक्तं विमुच्येदिति नान्यथा।
एतदाहुर्महाप्राज्ञा: सांख्ये वै मोक्षदर्शनम् ॥5॥

  • इसके उपरान्त कहते हैं- 'शौच, तप, दया, व्रतों के पालन आदि में दोनों समान हैं केवल दर्शन (दृष्टि या पद्धति) में अन्तर है।' इस पर युधिष्ठिर पुन: प्रश्न करते हैं कि जब व्रत, पवित्रता आदि में दोनों दर्शन समान हैं और परिणाम भी एक ही है तब दर्शन में समानता क्यों नहीं हैं? इसके उत्तर में भीष्म योग का विस्तृत परिचय देने के उपरान्त सांख्य विषयक जानकारी देते हैं। उक्त जानकारी के कुछ प्रमुख अंश इस प्रकार हैं-

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 301/96
  2. सूत्र-1
  3. सूत्र-2
  4. शांति पर्व 308-7
  5. शांति पर्व के सांख्य के सेश्वर स्वरूप पर अणिमा सेनगुप्ता के निष्कर्ष के लिए द्रष्टव्य पृष्ठ- 64 –इ.सां. था।
  6. शांति पर्व 208/28
  7. शांति पर्व 209-65
  8. 318/101
  9. भारतीय दर्शन का इतिहास भाग-2 गीता दर्शन प्रकरण में द्रष्टव्य
  10. शांति पर्व 314/1
  11. शांति पर्व 217/9
  12. आश्वमेधिक पर्व 36/4
  13. 1/96
  14. सूत्र 1/124
  15. शांति पर्व-210/28
  16. शांति पर्व अध्याय 174, 212
  17. 217/37
  18. 307/20
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