सांख्य दर्शन और बुद्ध  

बुद्धचरितम में सांख्य दर्शन

  • प्रसिद्ध बौद्ध आचार्य अश्वघोष की काव्य रचना 'बुद्धचरितम्' में भी सांख्य दर्शन आचार्य अराठ के दर्शन के रूप में मिलता है।
  • अश्वघोष का जीवनकाल ईसा की प्रथम शताब्दि में माना जाता है। बुद्धचरितम् में सांख्य शब्द से किसी दर्शन का उल्लेख न होने पर अराड दर्शन के सांख्य दर्शन कहने में कोई असंगति नहीं है।
  • बुद्धचरितम् के अनुसार अराड कपिल की दर्शन-परम्परा के आचार्य थे। अराड जिस सिद्धान्त को प्रस्तुत करते हैं उसे प्रतिबुद्ध कपिल का कहते हैं। 'सशिष्य: कपिलश्चेह प्रतिबुद्ध इति स्मृत:[1]' अपने दर्शन के प्रवक्ता के रूप में वे जैगीषव्य जनक वृद्ध पाराशर के प्रति भी सम्मान व्यक्त करते हैं इसके अतिरिक्त अराड दर्शन में प्रस्तुत व प्रयुक्त पदावली भी महाभारत में प्रस्तुत सांख्य का ही स्मरण कराती है।
  • बुद्धचरितम् में सांख्य दर्शन को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है-

श्रूयतामयमस्माकम् सिद्धान्त: श्रृण्वतां वर।
यथा भवति संसारो यथा चैव निवर्तते॥
प्रकृतिश्च विकारश्च जन्म मृत्युर्जरैव च।
तत्वावसत्वमित्युक्तं स्थिरं सत्वं परे हि तत्॥
तत्र तु प्रकृतिर्नाम विद्धि प्रकृतिकोविद।
पञ्चभूतान्यहंकारं बुद्धिमव्यक्तमेव च॥
अस्य क्षेत्रस्य विज्ञानात् इति संज्ञि च।
क्षेत्रज्ञ इति चात्मानं कथयन्त्यात्मचिंतका:॥
अज्ञान कनंर्म तृषणा च ज्ञेया: संसारहेतव:।
स्थितोऽस्मिन्स्त्रये जन्तुस्तत् सत्त्वं नाभिवर्तते॥
इत्यविद्या हि विद्वान् स पञ्चपर्वा समीहते।
तमो मोह महामोह तामिस्त्रद्वयमेव च॥
द्रष्टा श्रोता च मन्ता च कार्यकारणमेव च।
अहमित्येवमागम्य संसारे परिवर्तते॥[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. द्वादश: सर्ग:
  2. द्वादश सर्ग से संकलित
  3. शारीरस्थानम् 1/63, 64
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