समुद्रगुप्त  

(समुद्र गुप्त से पुनर्निर्देशित)


समुद्रगुप्त (335-376)
समुद्र्गुप्त गुप्त राजवंश का चौथा राजा और चन्द्रगुप्त प्रथम का उत्तरधिकरी था। वह भारतीय इतिहास में सबसे बड़े और सफल सेनानायक में से एक माना जाता है। समुद्रगुप्त, गुप्त राजवंश का तीसरा शासक था और उसका शासनकाल भारत के लिये स्वर्णयुग की शुरूआत कहा जाता है। समुद्रगुप्त एक उदार शासक, वीर योद्धा और कला का संरक्षक था। उसका नाम जावा पाठ में 'तनत्रीकमन्दका' के नाम से प्रकट है। समुद्रगुप्त के कई अग्रज भाई थे, फिर भी उसके पिता ने समुद्रगुप्त की प्रतिभा को देखकर उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। समुद्रगुप्त ने अपने जीवन काल में कभी भी पराजय का स्वाद नहीं चखा। उसके बारे में वी. ए. स्मिथ ने आकलन किया है कि समुद्रगुप्त प्राचीन काल में भारत का नेपोलियन था।

गुप्त वंश का उत्तराधिकारी

चंद्रगुप्त प्रथम के बाद समुद्रगुप्त मगध के सिंहासन पर बैठा। चंद्रगुप्त के अनेक पुत्र थे। पर गुण और वीरता में समुद्रगुप्त सबसे बढ-चढ़कर था। लिच्छवी कुमारी श्रीकुमारदेवी का पुत्र होने के कारण भी उसका विशेष महत्त्व था। चंद्रगुप्त ने उसे ही अपना उत्तराधिकारी चुना, और अपने इस निर्णय को राज्यसभा बुलाकर सभी सभ्यों के सम्मुख उद्घोषित किया। यह करते हुए प्रसन्नता के कारण उसके सारे शरीर में रोमांच हो आया था, और आँखों में आँसू आ गए थे। उसने सबके सामने समुद्रगुप्त को गले लगाया, और कहा - 'तुम सचमुच आर्य हो, और अब राज्य का पालन करो।' इस निर्णय से राज्यसभा में एकत्र हुए सब सभ्यों को प्रसन्नता हुई।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. इसी स्तम्भ पर सम्राट अशोक का एक लेख भी ख़ुदा हुआ है ।
  2. समुद्र्गुप्त के कुछ सिक्कों पर 'सर्वराजोच्छेत्ता' उपाधि मिलती है। उसकी दूसरी प्रसिद्ध उपाधि 'पराक्रमांक ' से भी समुद्रगुप्त के पराक्रम का पता चलता है।
  3. शिशुनंदि नामक एक राजा का उल्लेख पुराणों में मिलता है।

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