शास्त्रीय नृत्य  

शास्त्रीय नृत्य प्राचीन हिन्दू ग्रंथों के सिंद्धातों एवं तकनीकों और नृत्य के तकनीकी ग्रंथों तथा कला संबद्वता पर पूर्ण या आंशिक रूप से आधारित है। प्रारंभिक तौर पर यह माना जाता है कि भरत नाट्यशास्त्र को द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व के आस-पास लिखा गया था। शास्त्रीय नृत्य की अधिकतम प्रचलित प्रणालियाँ उच्च स्तर की विस्तृत प्रणालियों से शासित होती थीं और इनका उदय आम आदमी के बीच से ही होता था। शास्त्रीय नृत्य और लोक नृत्य के बीच मुख्य अंतर यह है कि यह पूर्व में जान-बूझकर कलात्मकता द्वारा किया गया प्रयास है। नृत्य और नाटक कला अपने अग्रिम सिंद्वातों और शास्त्रों के नियमों का कड़ाई से पालन करते हैं। भावना में चित्रित अवधारणा, व्यक्तिगत नृत्य की मोहकता और पृथकता की कला प्रवीणता तीनों ही शास्त्रीय नृत्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

नृत्य नाटिका

भारत में शास्त्रीय नृत्य-नाटिका एक नाट्य स्वरूप है। इसमें अभिनेता जटिल भंगिमापूर्ण भाषा के ज़रिये एक कथा को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करता है और यह स्वरूप अपने सार्वभौमिक प्रभाव में उपमहाद्वीप की भाषाई सीमाओं से ऊपर उठ चुका है। कुछ शास्त्रीय नृत्य-नाटिकाओं, जैसे-कथकली, कुचिपुड़ी और भागवत मेला में लोकप्रिय हिन्दू पौराणिक कथाओं का अभिनय होता है। 20वीं शताब्दी के नर्तक उदयशंकर और शांति वर्द्धन ने इन पारम्परिक नृत्य-नाटिकाओं से प्रेरित बैले का सृजन किया। समकालीन भारतीय निर्देशक और लेखक पारम्परिक नृत्य शैलियों को फिर से परख रहे हैं और अधिक मनोवैज्ञानिक पुनरावेदन तथा गहरे कलात्मक प्रभाव के लिए अपनी रचनाओं में इनका उपयोग कर रहे हैं। भारत के गाँवों में रहने वाले करोड़ों लोग अब भी लोक विरासत की गद्य नाटकों की लोकप्रियता के बावजूद ग्रामीण भारत में नृत्य-नाटिकाओं के माध्यम से अपना मनोरंजन करते हैं। शहरी दर्शकों में सीधे गद्य नाटकों की लोकप्रियता के बावजूद ग्रामीण भारत में नृत्य-नाटिका निश्चित रूप से अधिक गहरा प्रभाव छोड़ती है और ज़्यादा संतुष्टि प्रदान करती है, क्योंकि ग्रामीणों का सौंदर्य बोध अब भी परम्पराओं से जुड़ा हुआ है।

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