वैशेषिक दर्शन की ज्ञान मीमांसा  

वैशेषिकसम्मत ज्ञान मीमांसा

ज्ञान

ज्ञान (प्रमा) क्या है? ज्ञान और अज्ञान (अप्रमा) में क्या भेद है? ज्ञान के साधन अथवा निश्चायक घटक कौन हैं? इन और इसी प्रकार के कई अन्य प्रश्नों के उत्तर में ही ज्ञान के स्वरूप का कुछ परिचय प्राप्त किया जा सकता है। ज्ञान अपने आप में वस्तुत: एक निरपेक्ष सत्य है, किन्तु जब उसको परिभाषित करने का प्रयास किया जाता है तो वह विश्लेषक की अपनी सीमाओं के कारण ग्राह्यावस्था में सापेक्ष सत्य की परिधि में आ जाता है। फिर भी भारतीय मान्यताओं के अनुसार कणाद आदि ऋषि सत्य के साक्षात द्रष्टा हैं। अत: उन्होंने जो कहा, वह प्राय: ज्ञान का निरपेक्ष विश्लेषण ही माना जाता है।

महर्षि कणाद ने ज्ञान की कोई सीधी परिभाषा नहीं बताई। न्यायसूत्र में अक्षपाद गौतम ने ज्ञान को बुद्धि और उपलब्धि का पर्यायवाची माना।[1] प्रशस्तपाद ने ज्ञान के इन पर्यायों में 'प्रत्यय' शब्द को भी जोड़ा।[2] ऐसा प्रतीत होता है कि गौतम, कणाद और प्रशस्तपाद के समय तक ज्ञान के स्थान पर बुद्धि शब्द का प्रयोग होता था। शिवादित्य ने भी आत्माश्रय प्रकाश को बुद्धि कहा है।[3] अत: न्याय-वैशेषिक में बुद्धि का जो विश्लेषण किया गया है, उसी को ज्ञान का विश्लेषण मान लेना अनुपयुक्त नहीं होगा। ज्ञान को ही शब्दान्तर से प्रमा और विद्या भी कहा जाता है। वैशेषिक में ज्ञाता (आत्मा), ज्ञान और ज्ञेय को पृथक्-पृथक् माना गया है। मीमांसकों के अनुसार ज्ञान आत्मा का कर्म है। किन्तु न्याय-वैशेषिक के अनुसार ज्ञान आत्मा का गुण है। अद्वैत वेदान्त में ज्ञान या चैतन्य को आत्मा का गुण नहीं, अपितु स्वरूप या स्वभाव माना गया हो, किन्तु न्यायवैशेषिकों के अनुसार ज्ञान आत्मा का स्वभाव नहीं अपितु आगन्तुक गुण है। सांख्य में बुद्धि और ज्ञान को अलग-अलग मानते हुए यह कहा गया है कि बुद्धि (महत्त्व) प्रकृति का कार्य है और ज्ञान उसका साधन। कुछ पाश्चात्त्य मनीषियों ने ज्ञान को मन और विषय के बीच का एक सम्बन्ध बताया है, पर, जैसा कि पहले भी कहा गया, वैशेषिक ज्ञान को आत्मा का गुण मानते हैं, सम्बन्ध नहीं। विश्वनाथ पञ्चानन ने भी बुद्धि के दो भेद अनुभूति और स्मृति मान कर अनुभूति के अन्तर्गत प्रमाणों का निरूपण किया। अन्नंभट्ट ने वैशेषिकों के चिन्तन का सार सा प्रस्तुत करते हुए यह कहा कि-समस्त व्यवहार के हेतुभूत गुण को बुद्धि या ज्ञान कहते हैं।[4] बुद्धि या ज्ञान या प्रमा का निश्चय प्रमाणों के द्वारा सम्पन्न होता है।

प्रमाण का स्वरूप

व्युत्पत्ति की दृष्टि से प्रमाण शब्द प्र उपसर्गपूर्वक माङ् धातु से करण में ल्युट् प्रत्यय जोड़ने निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है- प्रमा का कारणं प्रमाण की परिभाषा विभिन्न दर्शनों के आचार्यों ने विभिन्न रूप से की है। सौत्रान्तिक तथा वैभाषिक बौद्धों ने यह कहा कि प्रमाण वह है, जिससे सम्यक ज्ञान हो। नागार्जुन प्रमाण की सत्ता नहीं मानते। दिङ्नाग की परम्परा में धर्मकीर्ति ने यह बताया कि विवक्षित अर्थ को बताने वाला सम्यक् तथा अविसंवादि ज्ञान प्रमाण है। जैन परम्परा में अकलंक के अनुसार पूर्व अनधिगत, व्यवसायात्मक सम्यक् ज्ञान तथा हेमचन्द्र के अनुसार पूर्वाधिगत सम्यक ज्ञान भी प्रमाण है। सांख्य सूत्रकार यह मानते हैं कि असन्निकृष्ट अर्थ का निश्चय करना प्रमा है और उसके साधकतम कारण प्रमाण हैं। भाट्ट मीमांसक अगृहीत अर्थ के ज्ञान को और प्राभाकर अनुभूति को प्रमाण मानते हैं। वेदान्त में अगृहीतग्राहित्व को प्रमाण का मुख्य आधार माना गया है।

न्यायपरम्परा में प्रचलित मन्तव्यों का समाहार करके प्रमाण की व्यापक परिभाषा देते हुए जयन्तभट्ट यह कहते हैं कि- 'वह सामग्री-साकल्य ही प्रमाण है, जो अव्यभिचारि तथा असंदिग्ध ज्ञान का जनक हो और जिसमें ज्ञान के बोध और अबोधस्वरूप समग्र कारणों का समावेश हो'।[5] आचार्य कणाद ने प्रमाण के लिए दोषराहित्य आवश्यक बताया।[6] वल्लभाचार्य ने भी सत्य ज्ञान को विद्या कहा है।[7] श्रीधर ने अध्यवसाय शब्द को भी प्रमाण की परिभाषा में जोड़ा।[8] शंकर मिश्र ने उपस्कार में यह कहा कि प्रमाण वह है जो ज्ञान का उत्पादक हो।[9]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. न्यायसूत्र
  2. प्र. पा. भा., पृ. 130
  3. स.प., पृ.76
  4. सर्वव्यवहारहेतुर्गुणो बुद्धिर्ज्ञानम्, त.सं.पृ. 30
  5. न्या. मं.
  6. वै.सू. 9.2.12
  7. न्या.ली., पृ. 766
  8. न्या. क. पृ. 435
  9. उपस्कार
  10. वै.सू.
  11. प्र.पा.भा. (श्रीनिवास), पृ. 144, 149, 150
  12. न्या. क. पृ. 443
  13. तत्र सविकल्पं वैशिष्ट्यावगाहि ज्ञानम् निर्विकल्पकं तु संसर्गानवगाहि ज्ञानम्, वै.प., पृ.18
  14. न्या. क. पृ. 34
  15. स.प.
  16. अस्येदं कार्य्यकारणं संयोगि विरोधि समवायि चेति लैंगिकम्, वै.सू. 9.2.1
  17. प्र. पा. भा. (श्रीनिवास), पृ. 151

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