वैशेषिक दर्शन की आचार-मीमांसा  

आचार-मीमांसा

प्राय: सभी दर्शनों के आकर ग्रन्थों में ज्ञान मीमांसा और तत्त्व मीमांसा के साथ-साथ किसी-न-किसी रूप में आचार का विवेचन भी अन्तर्निहित रहता है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के सम्यक विवेक के साथ जीवन में सन्तुलित कार्य करना ही आचार है। यही कारण है कि प्रत्येक विवेकशील व्यक्ति कभी-न-कभी यह सोचने के लिए बाध्य हो जाता है कि जीवन क्या है? संसार क्या है? संसार से उसका संयोग या वियोग कैसे और क्यों होता है? क्या कोई ऐसी शक्ति है, जो उसका नियन्त्रण कर रही है? क्या मनुष्य जो कुछ है उसमें वह कोई परिवर्तन ला सकता है? व्यष्टि और समष्टि में क्या अन्तर या सम्बन्ध है? एक व्यक्ति का अन्य व्यक्तियों या जगत के प्रति क्या कर्तव्य है? ये और कई अन्य ऐसे प्रश्न हैं जो एक ओर रहस्यमयी पारलौकिकता को स्पर्श करते हैं। प्रकारान्तर से यह कहा जा सकता है कि जो प्रयत्न-शृंखला सार्थक और सम्यक् उद्देश्य की पूर्ति के लिए दृष्ट को अदृष्ट के साथ या दृष्ट को दृष्ट के साथ जोड़ती है, वह लौकिक क्षेत्र में आचार कहलाती है। सभी भारतीय आस्तिक दर्शनों में आचार नहीं किया। अत: वैशेषिक ग्रन्थों में यत्र-तत्र जो कतिपय संकेत उपलब्ध होते हैं, उनके आधार पर ही यह कहा जा सकता है कि वैशेषिकों का आचारपरक दृष्टिकोण भी वेदमूलक ही है। इस धारणा की पुष्टि महर्षि कणाद के इन कथनों से हो जाती है कि-'लौकिक अभ्युदय और पारलौकिक नि:श्रेयसव तत्त्वज्ञानजन्य है, तत्त्वज्ञान धर्मजन्य है, और धर्म का प्रतिपादक होने और ईश्वरोक्त होने के कारण वेद ही धर्म का प्रमाण है।[1]'

वैशेषिक आचार संहिता के घटक

वैशेषिक की आचारपरक मान्यताओं के तीन प्रमुख आधार हैं। वैशेषिकों की आचारपरक विचारधारा का केन्द्रबिन्दु यह मान्यता है कि सुख का त्याग मोक्ष मार्ग की एक प्रमुख इति कर्तव्यता है। सुख भी अन्तत: दु:ख रूप ही है और दु:ख से छुटकारा ही मोक्ष है।

धर्माधर्मविवेक

वैशेषिक दर्शन के पहले चार सूत्रों से ही इस बात की भी पुष्टि होती है कि वैशेषिक की मान्यताओं के साथ धर्म का अनिवार्य सम्बन्ध है। गुणों की गणना में भी धर्म और अधर्म के समावेश से यह स्पष्ट होता है कि जीवात्मा धर्म और अधर्म आदि विशेष गुणों से युक्त है। अन्नंभट्ट के अनुसार विहित कर्मों से जन्य अदृष्ट धर्म और निषिद्ध कर्मों से जन्य अदृष्ट अधर्म कहलाता है।[2] कतिपय विद्वानों का यह कथन है कि धर्म और अधर्म शब्द सत्कर्म या असत्कर्म के नहीं, अपितु पुण्य और पाप के बोधक हैं, जो सत्कर्म और असत्कर्म के फल हैं।[3]'

शब्द को पृथक् प्रमाण न मानते हुए भी वैशेषिकों ने धर्म के विषय में वेद को ही प्रमाण माना है। वैशेषिक की साधना-पद्धति क्या थी? इस संदर्भ में कतिपय विद्वानों का यह मत है कि वह प्राय: उन दर्शनों से मिलती-जुलती है जो आत्मसंयम या सत्त्वशुद्धि को आचार की प्रमुख विधि मानते हैं। राग-द्वेष, जिस प्रवृत्ति को जन्म देते हैं, वह दु:ख और सुख का कारण बनकर फिर राग-द्वेष को जन्म देती है और इस प्रकार से एक दुश्चक्र सा चलता रहता है। उसको यम, नियम आदि रोक लें तो जीवन अपने सर्वोच्च लक्ष्य (मुक्ति) की प्राप्ति करवाने वाले मार्ग का अनुसरण कर सकता है।

वैशेषिकों की दृष्टि में सुख और दु:ख एक दूसरे से इतने जुड़े हुए हैं कि दु:ख से बचने के लिए सुख का भी त्याग आवश्यक है। सुख की तरह दु:ख भी आत्मा का एक आगन्तुक गुण है। उसके विनाश से आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। मोक्ष की स्थिति में आत्मा का दु:ख-सुखसहित सभी आगन्तुक गुणों से छुटकारा हो जाता है। इस संदर्भ में यह स्मरणीय है कि महात्मा बुद्ध का उपदेश यह था कि सुख, दु:ख या स्वार्थपरता से छुटकारा तब तक सम्भव नहीं है, जब तक आत्मा की नित्य सत्ता में विश्वास करना नहीं छूट जाता। बौद्धों के इस सिद्धान्त के विपरीत वैशेषिक आत्मा को नित्य मानते हैं, किन्तु उनकी यह भी मान्यता है कि सुख-दु:ख से छुटकारा और जीवन का अन्तिम ध्येय (मोक्ष) तब तक प्राप्त नहीं होता, जब तक यह न मालूम हो जाय कि आत्मा सभी अनुभवों से परे है।[4]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अथातो धर्म व्याख्यास्याम:। यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि: स धर्म:; तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्, वै.सू. 1.1.1-3
  2. विहितकर्मजन्यो धर्म:, निषिद्धकर्मजन्यस्त्वधर्म:, त.सं. पृ. 97
  3. भारतीय दर्शन की रूपरेखा, हिरियन्ना, पृ. 260
  4. भारतीय दर्शन की रूपरेखा, हिरियन्ना, पृ. 260
  5. कार्यायोजनधृत्यादे: पदात् प्रत्ययत: श्रुते:। वाक्यात् संख्याविशेषाच्व साध्यो विश्वविदव्यय:॥ न्प्या.कु.
  6. तदत्यन्तविमोक्षोऽपवर्ग:, न्या.सू., 1.1.22
  7. निर्बीजस्यात्मन: शरीरादिनिवृत्ति: पुन: शरीराद्यनुत्पत्तौ दग्धेन्धनत्ववत् उपशमो मोक्ष: प्र.पा.भा., पृ. 211
  8. तत्र दु:खात्यन्ताभावोऽपवर्ग:, न्या.ली.पृ. 580
  9. तन्नि:श्रेयसं धर्मादेव भवति द्रव्यादितत्त्वज्ञानं तस्य कारणत्वेन नि:श्रेयससाधनमित्यभिप्राय:, न्या. क. पृ. 313
  10. अतो नास्त्यात्मनो नित्यं सुखं तदभावान्न तदनुभवो मोक्षावस्था, किन्तु समस्तात्मविशेषगुणोच्छेदोपलक्षिता स्वरूपस्थिति:, न्या. क. पृ. 69
  11. उपस्कार

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