विजय का रहस्य  

वैदिक काल में प्रायः देवताओं और असुरों में संघर्ष होता रहता था। ये दोनों सभ्यताएं एक दूसरे को नष्ट करने पर तुली थीं। देवता दैवी सम्पदा के आगार थे, असुर पूर्णतया भौतिकवादी थे। उनमें अनेक प्रकार की कमियों थीं। वे अत्यन्त क्रूर एवं अत्याचारी थे, जबकि देवता चाहते थे कि सभी शान्तिपर्वक रहें। जो अच्छी बातें हो उन्हें सभी अपनाएं और मिल-जुलकर रहें। उनका उद्देश्य विभिन्नता में एकता था, विभिन्नता को नष्ट करके एकता लाना नहीं था। वेद कहता है-

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित दुखभागभवेत।।
सब सुखी रहे, किसी को भय न हो, सभी कल्याण को देखें तथा किसी को भी दु:ख प्राप्त न हो ।

लेकिन असुर गण केवल अपने ही विषय में सोचते थे, वे दूसरी विचारधाराओं को सहन नहीं करते थे। एक बार देवता और असुर ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उनसे आत्मा के विषय में पूछा। ब्रह्मा जी ने कहा कि जल में झांककर देखो, तुम्हे जो दिखाई देगा, वही आत्मा है। दोनों ने जल में झांका और उन्हें अपनी सूरत जल में दिखाई दी। दोनों ही सतुष्ट होकर चले गए। असुरों ने अपनी बुद्धि को लगाने का बिल्कुल प्रयास नहीं किया और यह समझ लिया कि शरीर ही सब कुछ है। इसको ही सुखी रखना कर्तव्य है। बस वे संसार के भोगों को भोगने और इन्द्रियों को हर प्रकार से तृप्त करने में लग गए, लेकिन देवताओं ने जब लौट कर इस पर विचार किया तो यह समझा कि यह शरीर तो आत्मा हो ही नहीं सकता क्योंकि आत्मा तो अविनाशी बताई जाती है जबकि यह शरीर नित्य नष्ट होता हुआ दिखाई पड़ता है। वे पुनः ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और अपनी शंका उनके सामने रखी। ब्रह्मा जी ने फिर उनसे जल में देखने के लिए कहा। अबकी बार उन्होंने नेत्रों में जिसको अकिंत हुए पाया उसे आत्मा समझा लेकिन यह नेत्रो में झांकता हुआ पुरुष सोते समय कहां चला जाता है। अतः वे बार-बार ब्रह्मा जी के पास जाते रहे जब तक कि उन्होंने आत्मा का अनुभव न कर लिया। असुर अपने शरीर को लेकर ही रह गए और उससे आगे नहीं बढ़ सके। वे घोर स्वार्थी तथा असामाजिक बन गए। इसी विषय को और स्पष्ट करने के लिए निम्न कथा है-

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सामवेद 861

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