वाधूल श्रौतसूत्र  

वाधूल शाखा

महादेव ने सत्याषाढ श्रौतसूत्र के अपने भाष्य (वैजयन्ती) के प्रारम्भ (भूमिका, श्लोक 7–9) में वाधूल को तैत्तिरीय की एक उपशाखा के रूप में उद्धृत किया गया है। किन्तु इस बात के अनेक प्रमाण मिलते हैं कि वाधूल तैत्तिरीय शाखा से सम्बद्ध न होकर उससे अलग एक स्वतन्त्र शाखा थी। इस विषय में कतिपय प्रमाण अधोलिखित हैं:–

  1. वाधूल श्रौतसूत्र में अनेक ऐसे मन्त्र हैं जो तैत्तिरीय संहिता या तैत्तिरीय ब्राह्मण में नहीं मिलते।
  2. वाधूल श्रौतसूत्र में कुछ मन्त्र तैत्तिरीय संहिता के मन्त्र के साथ पर्याप्त अन्तर रखते हैं, जैसे– देवो व: सविता प्रेरयतु[1], देवो व: सविता प्रार्पयतु[2], वसुभ्यस्त्वाऽनज्मि[3], वसुभ्यस्त्वा[4], विश्वधाया अस्युतरेणधाम्ना[5], विश्चधाया असि परमेण धाम्ना[6], रक्षायैत्वानारात्यै[7], स्फात्यै त्वा नारात्यै[8] इत्यादि।
  3. वाधूल श्रौतसूत्र में मन्त्रों का विनियोग तैत्तिरीयों से कई स्थलों पर भिन्न है, यथा– वाधूल श्रौतसूत्र[9] में जलते अंगारे को हटाते समय 'पृथिव्यै मूर्धानं मा निर्धाक्षी:' मन्त्र विनियुक्त है, जबकि तैत्तिरीय शाखानुयायी इस क्रम में 'निर्दग्धं रक्षो निर्दग्धा अरात्म:'[10] मन्त्र का प्रयोग करते हैं।
  4. तैत्तिरीय परम्परा में 'प्राणाय त्वा अपानाय त्वा, व्यानाय त्वा[11]' इन तीन मन्त्रों का विनियोग हविर्द्रव्य के पसीने में किया जाता है, जबकि वाधूल श्रौतसूत्र में यह कर्म चार मन्त्रों– प्राणाय त्वा, व्यानाय त्वा, अपानाय त्वा उदानाय त्वा[12] से किया जाता है।
  5. तैत्तिरीय परम्परा में दीर्घामनु प्रसिति मायुषे धाम्[13] इस एक मन्त्र का हविर्द्रव्य को पीसने के बाद दोनों हाथों को देखने में विनियोग होता है, जबकि वाधूल श्रौतसूत्र में दीर्घामनु प्रसितिं संसवेथाम्[14] मन्त्र का विनियोग चावल कणों को पीसने में तथा आयुषे धाम्[15] का दोनों हाथों को देखने में विनियोग होता है।
  6. तैत्तिरीय परम्परा में देवो व: सविता हिरण्यपाणि: प्रतिगृह्णातु[16] का विनियोग पिसे चावल के आटे को एकत्रित करने में किया जाता है, जबकि वाधूल में देवो व: सविता हिरण्यपाणि: प्रतिगृह्णात्वदब्धेन वश्चक्षुषाऽवेक्षेसुप्रजास्त्वाय[17] का विनियोग बिना पीसे अवशिष्ट चावल कणों को देखने में होता है।
  7. अग्न्युपस्थान के प्रकरण में वाधूल श्रौतसूत्र महाचमसोपस्थान[18], महासम्पदोपस्थान[19], वस्योपस्थान[20], सर्वदोपस्थान[21] आदि का विधान करता है जो तैत्तिरीय परम्परा में कहीं नहीं मिलते।
  8. अग्निचयन के प्रकरण में वाधूल श्रौतसूत्र कुछ इष्टिकाओं के चयन का विधान करता है जो तैत्तिरीय परम्परा में नहीं मिलता। उदाहरण के लिए योनिसंज्ञक इष्टकाओं का उल्लेख करता है।[22]

इन प्रमाणों से यह बात पुष्ट होती है कि वाधूल शाखा की स्वतन्त्र सत्ता थी और सम्भवत: इसकी अपनी संहिता भी थी जो अभी उपलब्ध नहीं है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. वाधूल श्रौतसूत्र, 2.1.11
  2. वाधूल श्रौतसूत्र, 1.1.11
  3. वाधूल श्रौतसूत्र, 2.12.4
  4. वाधूल श्रौतसूत्र, 1.1.13.3
  5. वाधूल श्रौतसूत्र, 2.3.12
  6. तैत्तिरीय संहिता, 1.1.3.2
  7. वाधूल श्रौतसूत्र, 2.4.28
  8. तैत्तिरीय संहिता, 1.1.4.13
  9. वाधूल श्रौतसूत्र, 2.6.8
  10. तै. सू. 1.1.7.5
  11. तै. सू. 1.1.6.7–9
  12. वाधूल श्रौतसूत्र, 2.6.26–29
  13. तै. सू. 1.1.6.11
  14. वाधूल श्रौतसूत्र, 2.6.30
  15. वाधूल श्रौतसूत्र, 2.6.31
  16. तै. सू. 1.6.12
  17. वाधूल श्रौतसूत्र, 2.6.32
  18. वाधूल श्रौतसूत्र, 1.20.31, 3.2.1
  19. वाधूल श्रौतसूत्र, 1.22.8
  20. वाधूल श्रौतसूत्र, 1.23.14–15
  21. वाधूल श्रौतसूत्र, 1.8.50
  22. वाधूल श्रौतसूत्र, 8.19.2, 26.1, 28.14 इत्यादि
  23. आ. ओरि. भाग 1, पृ. सं. 7, आ. ओरि. भाग 2।
  24. यस्का मौनो मूको वाधूलो वर्षपुष्पो: इत्येते यस्का:। बौधायन प्रवरसूत्र 6:421.5, आत्रेयवाध्यश्ववाधूल वसिष्ठकण्व शुनक संस्कृति यस्का राजन्यवैश्या इत्येते नारांशसा: प्रकीर्तिता: 1. बौधायन प्रवरसूत्र 54:465.11–12, द्रष्टव्य– आपस्तम्ब श्रौतसूत्र, 24.6.1।
  25. कार्तकौजपादयश्च। पा. सू. 6.2.37
  26. वाधूल श्रीनिवासार्य पादाम्भोजोप जीवनम्।
    जन्यपुङ्गवसद् भक्त श्रीनिवासगुरुं भजे।।
    –प्रपन्नामृतम्, अध्या. 1, श्लोक–1।
  27. वाधूलान्वयरङ्ग राजविदुष: शिष्येण विद्यानिधे:...आपस्तम्ब श्रौतसूत्र भाष्य 1.1।
  28. वित्सल एम, आइने फुन्फ्टे मिताइलुंग यूबेर दास–वाधूलसूत्र स्तूदिएनत्सुर इण्डोलाजी एण्ड इरानितिक, भाग 1, पृ.77।
  29. स्टाल, जे. एफ. –नम्बूदिरी वेद रेसिटेशन, हाग, 196, पृ. 62।
  30. वाधूल अन्वाख्यान ब्राह्मण, 1.1
  31. आ. ओरि. भाग 4, पृ. 4–5
  32. आ. ओरि. भाग 4, पृष्ठ 5
  33. कल्पागमसंग्रह, अङ्यार हस्तलेख (सं. 6837), पृ. 10।
  34. आग्निवेश्यगृह्यसूत्र त्रिवेन्द्रम संस्कृत सीरीज 154, 1940, भूमिका, पृ. 3।
  35. त्सुजी, मेम्वायर्स ऑफ दि रिसर्च डिपार्टमेन्ट ऑफ टोयो, बुन्को 19, टोकिओ 1960, पृ. 95।
  36. विलसेल, वही पृ. 95
  37. इति प्रथम: प्रश्न: समाप्त: (षष्ठ प्रपाठक के अंत में) अथ द्वितीय: प्रश्न: (सप्तक प्रपाठक के प्रारम्भ में)।
  38. वित्सेल, वही पृ. 78
  39. वाधूल श्रौतसूत्र, 2–12–10
  40. वाधूल श्रौतसूत्र, 5.10.30
  41. आ. ओरि. भाग 4, पृ. 1
  42. वित्सेल, भाग 4 पृ. 100, टि. 22
  43. सी. जी. काशीकर ए सर्वे ऑफ दि श्रौतसूत्राज बाम्बे विश्वविद्यालय जर्नल भाग 35, खण्ड, 2, सित. 1966, पृ. 65।
  44. वित्सेल, भाग 4, पृ. 79–80
  45. 2.12.33
  46. 1.7.46
  47. 1.7.47
  48. वाधूल श्रौतसूत्र 1.1.14
  49. वाधूल श्रौतसूत्र 11.4.3
  50. वाधूल श्रौतसूत्र 6.1.22
  51. वाधूल श्रौतसूत्र 3.13.5
  52. 1.5.1
  53. 1.7.1
  54. 4.5.1
  55. 1.4.36
  56. 1.7.53
  57. 2.12.6
  58. 7.23.28
  59. 3.2.28
  60. 3.3.1
  61. वाधूल श्रौतसूत्र1.9.18
  62. 1.21
  63. वाधूल श्रौतसूत्र 1.20.26–30
  64. वाधूल श्रौतसूत्र 3.6.10–11
  65. 1.1.9
  66. 8.7.3
  67. 9.1.4
  68. वाधूल श्रौतसूत्र, 3.3.10, 11.14.38
  69. वाधूल श्रौतसूत्र 3.2.21
  70. 11.26.36
  71. 14.3.10
  72. 11.12.8
  73. 3.14.5–6
  74. 3.1.14
  75. 1.16.15
  76. सत्या. श्रौ. सू. पर वैजयन्ती, भूमिका, श्लोक 7–9
  77. काशीकर, वही, पृ. 64
  78. द्र. वाधूल श्रौतसूत्र भूमिका, पृ. 56–61
  79. बौधायन श्रौतसूत्र 6.24 183.18–19
  80. 6.14.25
  81. आ. ओरि. भाग 2, पृ. 146
  82. वाधूल श्रौतसूत्र, 5.1.17–18
  83. बौधायन श्रौतसूत्र, 20.25: 55.6, 24.34: 110.15
  84. वाधूल श्रौतसूत्र, 6.4.26
  85. बौधायन श्रौतसूत्र, 6.8.165
  86. वाधूल श्रौतसूत्र, 6.8.44
  87. अथैनां प्रदक्षिणमावर्त्याद्भिरक्ष्युक्ष्योदीची मुत्सृजति – बौधायन श्रौतसूत्र 6.15, 172.12
  88. वाधूल श्रौतसूत्र, 1.2
  89. बौधायन श्रौतसूत्र, 11.8.63.7
  90. 29.1.5, 368.1–3
  91. वाधूल श्रौतसूत्र, 8.19.3
  92. बौधायन प्रवर सूत्र, 6.421.5
  93. यस्का मौनो मूको वाधूलो वर्षपुष्यो ....... इत्येते यस्का:
  94. वाधूल श्रौतसूत्र, 11.1.2
  95. वाधूल श्रौतसूत्र, 11.6.7
  96. वाधूल श्रौतसूत्र, 11.25.21
  97. वाधूल श्रौतसूत्र, 11.25.11
  98. वाधूल श्रौतसूत्र, 10.9.24.25

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