वल्लभ संप्रदाय  

वल्लभ संप्रदाय
वल्लभाचार्य
विवरण 'वल्लभ सम्प्रदाय' हिन्दुओं के वैष्णव सम्प्रदायों में से एक है। वल्लभाचार्य ने अपने शुद्धाद्वैत दर्शन के आधार पर इस मत का प्रतिपादन किया था।
अन्य नाम 'वल्लभ मत', 'पुष्टिमार्ग'
संस्थापक वल्लभाचार्य
भक्ति के प्रकार 'मर्यादाभक्ति' तथा 'पुष्टिभक्ति'
विशेष वल्लभाचार्य ने पुष्टिमार्ग की स्थापना समय की आवश्यकता का अनुभव करके की थी। अपने 'कृष्णश्रय' नामक प्रकरण-ग्रन्थ में उन्होंने उस समय का विशद चित्रण किया है।
संबंधित लेख हिन्दू धर्म, वल्लभाचार्य, वैष्णव सम्प्रदाय, निम्बार्क सम्प्रदाय
अन्य जानकारी जो भक्त साधन निरपेक्ष हो, भगवान के अनुग्रह से स्वत: उत्पन्न हो और जिसमें भगवान दयालु होकर स्वत: जीव पर दया करें, वह 'पुष्टिभक्ति' कहलाती है। ऐसा भक्त भगवान के स्वरूप दर्शन के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु के लिए प्रार्थना नहीं करता।

पुष्टिमार्ग / वल्लभ सम्प्रदाय
वल्लभ सम्प्रदाय भक्ति का एक संप्रदाय, जिसकी स्थापना महाप्रभु वल्लभाचार्य ने की थी। इसे 'वल्लभ संप्रदाय' या 'वल्लभ मत' भी कहते हैं। चैतन्य महाप्रभु से भी पहले 'पुष्टिमार्ग' के संस्थापक वल्लभाचार्य राधा की पूजा करते थे, जहां कुछ संप्रदायों के अनुसार, भक्तों की पहचान राधा की सहेलियों (सखी) के रूप में होती है, जिन्हें राधाकृष्ण के लिए अंतरंग व्यवस्था करने के लिए विशेषाधिकार प्राप्त होता है। अपने वैष्णव सहधर्मियों के साथ राधावल्लभी, भागवतपुराण के प्रति अपार श्रद्धा रखते हैं, लेकिन कुछ अंतरंगता जो राधा और गोपियों के साथ रिश्तों की परिधि के बाहर है, वह इस सम्प्रदाय के दर्शन में शामिल नहीं है।

संस्थापक

वल्लभाचार्य ने अपने शुद्धाद्वैत दर्शन के आधार पर इस मत का प्रतिपादन किया, जो भक्त साधन निरपेक्ष हो, भगवान के अनुग्रह से स्वत: उत्पन्न हो और जिसमें भगवान दयालु होकर स्वत: जीव पर दया करें, वह 'पुष्टिभक्ति' कहलाती है। ऐसा भक्त भगवान के स्वरूप दर्शन के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु के लिए प्रार्थना नहीं करता। वह आराध्य के प्रति आत्मसमर्पण करता है। इसको 'प्रेमलक्षणा भक्ति' भी कहते हैं। ऐसी भक्ति कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठ बताई गई है।

भक्ति के प्रकार

भागवत पुराण के अनुसार भगवान् का अनुग्रह ही पोषण या पुष्टि है।[1] आचार्य वल्लभ ने इसी भाव के आधार पर अपना पुष्टिमार्ग चलाया। इसका मूल सूत्र उपनिषदों में पाया जाता है। कठोपनिषद में कहा गया है कि परमात्मा जिस पर अनुग्रह करता है उसी को अपना साक्षात्कार कराता है। वल्लभाचार्य ने जीव आत्माओं को परमात्मा का अंश माना है जो चिंगारी की तरह उस महान् आत्मा से छिटके हैं। यद्यपि ये अलग-अलग हैं तथापि गुण में समान हैं। इसी आधार पर वल्लभ ने अपने या पराये शरीर को कष्ट देना अनुचित बताया है। पुष्टिमार्ग में परमात्मा की कृपा के शम-दमादि बहिरंग साधन हैं और श्रवण, मनन, निदिध्यासन अन्तरंग साधन। भगवान में चित्त की प्रवणता सेवा है और सर्वात्मभाव मानसी सेवा है। आचार्य की सम्मति में भगवान का अनुग्रह (कृपा) ही पुष्टि है। भक्ति दो प्रकार की है-

  1. मर्यादाभक्ति
  2. पुष्टिभक्ति

मर्यादाभक्ति - इस में शास्त्रविहित ज्ञान और कर्म की अपेक्षा होती है। वेद-विहित कर्म का अनुसरण करना तथा ज्ञानप्राप्ति का प्रयत्न करना मर्यादा मार्ग कहा जाता है।

पुष्टिभक्ति - भगवान के अनुग्रह से जो भक्ति उत्पन्न होती है, वह पुष्टिभक्ति कहलाती है। ऐसा भक्त भगवान के स्वरूप दर्शन के अतिरिक्त और किसी वस्तु के लिए प्रार्थना नहीं करता। वह अपने आराध्य के प्रति सम्पूर्ण आत्मसमर्पण करता है। इसको प्रेमलक्षणा भक्ति भी कहते हैं। नारद ने इस भक्ति को कर्म, ज्ञान और योग से भी श्रेष्ठ बतलाया है। उनके अनुसार यह भक्ति साधन नहीं, स्वत: फलरूपा है। पुष्टिमार्ग की प्राचीनता प्रमाणित करने के लिए [2] श्रुति को उद्धृत किया जाता है, जिसमें आत्मा की उपलब्धि केवल कृपा के द्वारा बतायी गयी है। [3] कठोपनिषद में भी भगवान के प्रसाद से ही आत्मदर्शन सम्भव बताया गया है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 'पोषणं तदनुग्रह:' भागवत पुराण (2 / 10)
  2. 'मुण्डकोपनिषद' की 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्य:'
  3. 'कठोपनिषद' (1/ 2/ 20)
  4. तत्त्वदीप-निबन्ध शा0 प्र0, 46
  5. [सहायक ग्रन्थ-
    1. अणुभाष्य : वल्लभाचार्य;
    2. श्रीसुबोधिनी: वल्लभाचार्य;
    3. तत्त्वदीप-निबन्ध: सम्प्रदाय प्रदीप: गदाधरदास द्विवेदी,
    4. अष्टछाप और वल्लभसम्प्रदाय: दीनदयालु गुप्त
    5. भागवत धर्म : बलदेव उपाध्याय।]

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