राष्ट्रपति  

निर्वाचक मण्डल

अनुच्छेद 54 के अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन ऐसे निर्वाचक मण्डल के द्वारा किया जाएगा, जिसमें संसद (लोकसभा तथा राज्यसभा) तथा राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल होंगे। राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में संसद के मनोनीत सदस्य, राज्य विधान सभाओं के मनोनीत सदस्य तथा राज्य विधान परिषदों के सदस्य (निर्वाचित एवं मनोनीत दोनों) शामिल नहीं किये जाते। संघ राज्य क्षेत्रों की विधानसभाओं के सदस्यों को भी 70वें संविधान संशोधन के पूर्व राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में शामिल नहीं किया जाता था लेकिन 70वें संविधान संशोधन द्वारा यह व्यवस्था कर दी गयी है कि दो संघ राज्य क्षेत्रों, यथा पाण्डिचेरी तथा राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली की विधानसभाओं के सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में शामिल किये जायेंगे। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि केवल इन दोनों संघ राज्य क्षेत्रों में ही विधानसभा का गठन हुआ है।

राष्ट्रपति के चुनाव पर प्रभाव

संविधान सभा में राष्ट्रपति के निर्वाचन प्रक्रिया पर विचार करते समय यह ध्यान नहीं दिया गया था कि निर्वाचक मण्डल में से कोई स्थान रिक्त हो तो राष्ट्रपति का चुनाव कैसे होगा? 1957 में जब राष्ट्रपति का चुनाव किया गया तो निर्वाचक मण्डल में कुछ स्थान ख़ाली थे। इसलिए राष्ट्रपति के चुनाव को इस आधार पर चुनौती दी गई कि निर्वाचक मण्डल में स्थान रिक्त होने के कारण राष्ट्रपति का चुनाव अवैध है। बाद में 1961 में ग्याहरवाँ संविधान संशोधन के तहत यह व्यवस्था की गयी कि निर्वाचक मण्डल में स्थान रिक्त होते हुए भी राष्ट्रपति का चुनाव कैसे कराया जा सकता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. नोट - भारतीय संविधान के अनुसार वर्ष 2002 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी 1971 की जनगणना के आंकड़े ही मान्य थे, केवल झारखण्ड, उत्तरांचल और छत्तीसगढ़ जैसे नये बने तीन राज्यों के विधायकों के मतों का मूल्य अलग से तय किया गया है।
  2. (अनुच्छेद 80, 1)

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