रामकृष्ण गोपाल भंडारकर  

रामकृष्ण गोपाल भंडारकर
रामकृष्ण गोपाल भंडारकर
पूरा नाम रामकृष्ण गोपाल भंडारकर
जन्म 6 जुलाई, 1837
जन्म भूमि रत्नागिरि, महाराष्ट्र
मृत्यु 24 अगस्त, 1925
कर्म भूमि भारत
भाषा संस्कृत, पालि
विद्यालय एल्फ़िंस्टन कॉलेज, मुम्बई
शिक्षा एम. ए.
पुरस्कार-उपाधि 'डॉक्टरेट' 1885, 'नाइट' 1911
प्रसिद्धि समाजसुधारक तथा सार्वजनिक नेता
विशेष रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने अपने समय के सामाजिक आंदोलनों में अहम भूमिका निभाते हुए विधवा विवाह का समर्थन किया। साथ ही इन्होंने जाति-प्रथा एवं बाल विवाह की कुप्रथा का खण्डन भी किया।
अन्य जानकारी रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने ब्राह्मी, खरोष्ठी आदि प्राकृत भाषाओं का अध्ययन करके शोध के रूप में जो पांच विशाल खंड प्रकाशित किए वे पुरातत्व के इतिहासकारों के लिए आज भी मार्गदर्शक हैं।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची

रामकृष्ण गोपाल भंडारकर (अंग्रेज़ी: R. G. Bhandarkar, जन्म: 6 जुलाई, 1837, रत्नागिरि, महाराष्ट्र; मृत्यु: 24 अगस्त, 1925) भारत के प्रसिद्ध इतिहासविद, समाज सुधारक और शिक्षाशास्त्री थे। 'ऑल इण्डिया सोशल कांफ़्रेंस' (अखिल भारतीय सामाजिक सम्मलेन) के सक्रिय सदस्य रहे रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने अपने समय के सामाजिक आंदोलनों में अहम भूमिका निभाते हुए अपने शोध आधारित निष्कर्षों के आधार पर विधवा विवाह का समर्थन किया। साथ ही उन्होंने जाति-प्रथा एवं बाल विवाह की कुप्रथा का खण्डन भी किया। प्राचीन संस्कृत साहित्य के विद्वान् की हैसियत से उन्होंने संस्कृत की प्रथम पुस्तक और संस्कृत की द्वितीय पुस्तक की रचना भी की, जो अंग्रेज़ी माध्यम से संस्कृत सीखने की सबसे आरम्भिक पुस्तकों में से एक हैं।

परिचय

रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर का जन्म 6 जुलाई, 1837 ई. को महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले के मालवण नामक स्थान में एक साधारण परिवार में हुआ था। इनके पिता मालवण के मामलेदार के अधीनस्थ मुंशी (क्लर्क) थे। शुरुआती शिक्षा में आयी कठिनाई के बाद जब इनके पिता का स्थानांतरण रत्नागिरी ज़िले के राजस्व विभाग में हुआ तो इन्हें अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ने का मौका मिला।[1]

शिक्षा

रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर ने रत्नागिरी से स्कूली शिक्षा पूरी करके 1853 में मुम्बई के एल्फ़िंस्टन कॉलेज में दाखिला लिया, जहाँ इन्होंने जिन जानी मानी हस्तियों से शिक्षा प्राप्त की, उनमें प्रथम राष्ट्रवादी 'चिंतक' और 'ड्रेन थियरी' के प्रतिपादक दादाभाई नौरोज़ी प्रमुख थे। दादाभाई नौरोज़ी के प्रोत्साहन के कारण ही अंग्रेज़ी साहित्य, प्राकृतिक विज्ञान और गणित के प्रति रुचि के बावजूद भण्डारकर ने संस्कृत और पालि के ज्ञान के सहारे गौरवशाली अतीत के पुनर्निर्माण हेतु इतिहास-लेखन को अपनाया। 1862 में ये एल्फ़िंस्टन कॉलेज के पहले बैच से ग्रेजुएट होने वालों में से एक थे। वहाँ पर बी. ए. तथा एम. ए. की परीक्षाओं में इन्होंने सर्वोत्तम अंक प्राप्त किए। 1863 में ही इन्होंने परास्नातक की उपाधि प्राप्त की।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

भारतीय चरित कोश |लेखक: लीलाधर शर्मा 'पर्वतीय' |प्रकाशक: शिक्षा भारती, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली |पृष्ठ संख्या: 568 |

  1. {पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=भारतीय चरित कोश|लेखक=लीलाधर शर्मा 'पर्वतीय'|अनुवादक=|आलोचक=|प्रकाशक=शिक्षा भारती, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली|संकलन= |संपादन=|पृष्ठ संख्या=725|url=}}

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