रतन थियम  

रतन थियम
रतन थियम
पूरा नाम रतन थियम
जन्म 20 जनवरी, 1948
जन्म भूमि मणिपुर
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र नाटककार, रंगमंच निर्देशक
मुख्य रचनाएँ 'द किंग ऑफ़ द डार्क चेंबर', 'ऋतुसंहार', 'अंधा युग', 'चक्रव्यूह' (1984) आदि।
पुरस्कार-उपाधि पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, कालिदास सम्मान
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी रतन थियम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक रह चुके हैं।

रतन थियम (अंग्रेज़ी: Ratan Thiyam, जन्म:20 जनवरी, 1948) प्रसिद्ध नाटककार, रंगमंच निदेशक और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के पूर्व निदेशक है। इन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के साथ कई नाटकों का निर्देशन किया। रतन थियम पारम्परिक संस्कृत नाटकों को उनकी आधुनिक व्याख्या के साथ प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते है। उनका रंगकर्म अद्भुत रंग-संयोजन और अप्रतिम लय के कारण अनूठा है। वे अपना चित्रकार व कवि होना न सिर्फ़ अपनी चित्रकृतियों व कविताओं में व्यक्त करते है बल्कि उनका रंगकार्य भी इनका अचूक प्रमाण है। वे नाट्यविद्या और उससे सम्बद्ध कला माध्यमों के विकास में विशेष रूप से सक्रिय रहे हैं। उन्होंने अनेक भारतीय एवं विदेशी नाटकों का मंचन करने के साथ-साथ भास के दो नाटकों, कर्णभारम्‌ और उरूभंगम्‌ का मंचन किया है।

जीवन परिचय

रतन थियम का जन्म 20 जनवरी, 1948 को मणिपुर में हुआ था। रतन थियम को लेखन और मंचन में प्राचीन भारतीय थिएटर परंपरा के प्रयोग के लिए जाना जाता है।

आन्दोलित परिवेश का उद्वेलित रंग-सर्जक

रतन थियम देश के शीर्ष रंग निर्देशक हैं जो अपने स्वप्न और सर्जना का रंगमंच पिछले चार दशकों में रचते आ रहे हैं। वे आन्दोलित परिवेश के उद्वेलित व्यक्तित्व हैं जो निरन्तर उस अशान्त समय का रचनात्मक प्रतिवाद करते आ रहे हैं जो उनके सिरहाने उनको लगातार विचलित करता रहा है। मणिपुर में रतन थियम को अपनी जमीन और उसकी नब्ज का पता है, वे वहाँ बिताये अपने पूरे जीवन के एक तरह से सम्वेदनशील साक्ष्य की तरह हैं जो अपने आसपास से अत्यन्त विचलित रहते हुए, तमाम खतरों में रहते हुए भी रंगकर्म की लौ को बचाये हुए हैं। रतन थियम नाटकों की समीक्षा करते हुए नाटक करने लगे थे। उनके पिता मणिपुरी नृत्य शैली के प्रतिबद्ध कलाकार थे। रतन थियम पेंटिंग करते थे, लघु कहानियाँ, कविताएँ और नाटक भी लिखे। नाट्य समीक्षक होते हुए ही उन्होंने इस बात को महसूस किया कि पूर्णकालिक रंग-शिक्षा की उनको ज़रूरत है। यही ज़रूरत उनको राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय पढ़ने के लिए ले गयी। सत्तर के दशक के आरम्भ में वे दिल्ली आये और पाँच-छः वर्षों में ही उन्होंने अपनी क्षमताओं की एक बड़ी लकीर खींची। रतन थियम ने यहाँ समय व्यतीत करके फिर अपनी जमीन, मणिपुर लौट गये और अपनी खुद की थिएटर रेपर्टरी कोरस की स्थापना की। रतन थियम अपनी ज़रूरत के लिए दो एकड़ की पर्याप्त जमीन का इन्तजाम किया और कलाकारों के साथ यहीं अपनी दुनिया खड़ी की। एक थिएटर, तीन सौ लोगों के नाटक देखने के लिए और कलाकारों के लिए उगाने-बनाने-खाने और रहने का बन्दोबस्त। इस ढंग की परिकल्पना शायद सबसे पहले उन्होंने ही की।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. रतन थियम : आन्दोलित परिवेश का उद्वेलित रंग-सर्जक (हिंदी) सुनील मिश्र (ब्लॉग)। अभिगमन तिथि: 4 नवम्बर, 2014।
  2. दिखा रतन थियम का जादू (हिंदी) वेबदुनिया हिंदी। अभिगमन तिथि: 4 नवम्बर, 2014।
  3. अंधेरे का राजा और रोशनियाँ (हिंदी) रंगवार्ता। अभिगमन तिथि: 4 नवम्बर, 2014।

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