मोढेरा  

मोढेरा गुजरात के ऐतिहासिक और प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है। यह मैसाणा से 25 किलोमीटर और अहमदाबाद से 102 किलोमीटर की दूरी पर स्‍थित है, जहाँ मातं‍गि का कुल स्थान है। मोढेरा में राजा भीमदेव प्रथम द्वारा बनवाया गया विश्व प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर है, जिसकी सुन्दरता और अद्भुत स्थापत्य सभी को अपनी ओर आकर्षित करता है। यह मन्दिर मोढेरा से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मोढेरा से ही लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर 'डीसा' है, जहाँ सिद्धाम्बिका माता का मन्दिर है।

पौराणिक इतिहास

मोढेरा का इतिहास बहुत ही प्राचीन है। मोढ़ लोग मोढेश्वरी माँ के आनुयाई हैं, जो अंबे माँ के अठारह हाथ वाले स्वरूप की उपासना करते हैं। इस तरह मोढेरा मोढ़ वैश्य व मोढ़ ब्राह्मण की मातृभूमि है। इस स्थान पर बहुत से देवी-देवताओं के चरण पड़े हैं। मान्यता है कि इस स्थान पर ही यमराज (धर्मराज) ने 1000 वर्ष तक तपस्या की थी, जिनका तप देखकर देवराज इंद्र को अपने आसन का खतरा महसूस हुआ, लेकिन यमराज ने कहा कि वे तो त्रिलोक के भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तप कर रहे हैं। शिव ने प्रसन्न होकर यमराज से कहा कि आज से इस स्थान का नाम तुम्हारे नाम 'यमराज' (धर्मराज) पर 'धर्मारण्य' होगा।

श्रीराम का आगमन

स्कंदपुराण और ब्रह्मपुराण के अनुसार भगवान श्रीराम भी इस स्थान पर आए थे। मान्यता के अनुसार जब भगवान राम ने लंका के राजा रावण का वध कर दिया, तब वे ब्राह्मण की हत्या से मुक्ति हेतु इस नगर में यज्ञ करने हेतु आए थे। जब राम यहाँ आये, तब एक स्थानीय महिला रो रही थी। सभी ने रोने का कारण जानना चाहा, लेकिन महिला ने कहा कि "मैं सिर्फ प्रभु श्रीराम को ही कारण बताऊँगी।" राम को जब यह पता चला तो उन्होंने उस महिला से कारण जानना चाहा। महिला ने बताया कि इस स्थान से यहाँ के मूल निवासी वैश्य, ब्राह्मण आदि पलायन करके चले गए हैं, उन्हें वापस लाने का उपाय करें। तब श्रीराम ने इस नगर को पुनः बसाया व सभी पलायन किए हुए लोगों को वापस बुलाया और नगर की रक्षा का भार हनुमान को दिया। लेकिन धर्मारण्य की खुशियाँ ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकीं। कान्यकुब्ज राजा कनोज अमराज ने यहाँ की जनता पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। धर्मारण्य की जनता ने राजा को समझाया कि हनुमानजी इस नगरी के रक्षक हैं। आप उनके प्रकोप से डरें, लेकिन राजा ने जनता की बात नहीं मानी। राजा से त्रस्त होकर फिर कुछ लोग कठिन यात्रा कर रामेश्वर पहुँचे, जहाँ हनुमानजी से अनुरोध किया और धर्मारण्य कि रक्षा करने का प्रभु श्रीराम का वचन याद दिलाया। हनुमानजी ने वचन की रक्षा करते हुए राजा को सबक सिखाया और नगर की रक्षा की।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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