मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया  

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया
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पूरा नाम डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया
जन्म 15 सितम्बर, 1861
जन्म भूमि कर्नाटक
मृत्यु 14 अप्रैल, 1962
नागरिकता भारतीय
प्रसिद्धि इंजीनियर, वैज्ञानिक और निर्माता
पद मैसूर के दीवान
शिक्षा इंजीनियरिंग
विद्यालय पूना इंजीनियरिंग कॉलेज
पुरस्कार-उपाधि भारत रत्न
अन्य जानकारी डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के जन्मदिन (15 सितम्बर) को भारत में 'अभियन्ता दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
अद्यतन‎ 13:16, 13 मार्च 2011 (IST)

डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया (अंग्रेज़ी: Dr. Mokshagundam Vishveshwariah, जन्म- 15 सितम्बर, 1861, कर्नाटक; मृत्यु- 14 अप्रैल 1962) को आज भी "आधुनिक भारत के विश्वकर्मा" के रूप में बड़े सम्मान के साथ स्मरण किया जाता है। अपने समय के बहुत बड़े इंजीनियर, वैज्ञानिक और निर्माता के रूप में देश की सेवा में अपना जीवन समर्पित करने वाले डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया को भारत ही नहीं वरन् विश्व की महान् प्रतिभाओं में गिना जाता है।

जीवन परिचय

सर एम. विश्वेश्वरैया के जन्मदिन को 'अभियन्ता दिवस' के रूप में मनाया जाता है। सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया बहुत ही सौम्य विधारधारा वाले इंसान थे। मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म मैसूर (जो कि अब कर्नाटक में है) के 'मुद्देनाहल्ली' नामक स्थान पर 15 सितम्बर, 1861 को हुआ था। बहुत ही ग़रीब परिवार में जन्मे विश्वेश्वरैया का बाल्यकाल बहुत ही आर्थिक संकट में व्यतीत हुआ। उनके पिता वैद्य थे। वर्षों पहले उनके पूर्वज आंध्र प्रदेश के 'मोक्षगुंडम' से यहाँ पर आये और मैसूर में बस गये थे। दो वर्ष की आयु में ही उनका परिचय रामायण, महाभारत और पंचतंत्र की कहानियों से हो गया था। ये कहानियाँ हर रात घर की वृद्ध महिलाएँ उन्हें सुनाती थीं। कहानियाँ शिक्षाप्रद व मनोरंजक थी। इन कहानियों से विश्वेश्वरैया ने ईमानदारी, दया और अनुशासन जैसे मूल्यों को आत्मसात किया।

सूझबूझ

विश्वेश्वरैया जब केवल 14 वर्ष के थे, तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई। क्या वह अपनी पढ़ाई जारी रखें ? इस प्रश्न पर तब विचार-विमर्श हुआ जब उन्होंने अपनी माँ से कहा, 'अम्मा, क्या मैं बंगलौर जा सकता हूँ? मैं वहाँ पर मामा रमैया के यहाँ रह सकता हूँ। वहाँ मैं कॉलेज में प्रवेश ले लूंगा।' 'पर बेटा....तुम्हारे मामा अमीर नहीं हैं। तुम उन पर बोझ बनना क्यों चाहते हो?' उनकी माँ ने तर्क दिया। 'अम्मा, मैं अपनी ज़रुरतों के लिए स्वयं ही कमाऊँगा। मैं बच्चों का ट्युशन पढ़ा दूँगा। अपनी फ़ीस देने और पुस्तकें ख़रीदने के लिए मैं काफ़ी धन कमा लूँगा। मेरे ख्याल से मेरे पास कुछ पैसे भी बच जायेंगे। जिन्हें मैं मामा को दे दूँगा।' विश्वेश्वरैया ने समझाया। उनके पास हर प्रश्न का उत्तर था। समाधान ढंढने की क्षमता उनके पूरे जीवन में लगातार विकसित होती रही और इस कारण वह एक व्यावहारिक व्यक्ति बन गये। यह उनके जीवन का सार था और उनका संदेश था- 'पहले जानो, फिर करो।' 'जाओ मेरे पुत्र, भगवान तुम्हारे साथ है।' उनकी माँ ने कहा। उनके मामा ने बहुत गर्मजोशी से उनका स्वागत किया। विश्वेश्वरैया ने उन्हें अपनी योजना बताई। मामा ने प्यार से उन्हें थपथपाते हुए कहा, 'तुम बहुत होशियार हो। तुम्हें अच्छी से अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए।'

शिक्षा

पढ़ने लिखने में बाल्यकाल से ही तीव्र बुद्धि के स्वामी विश्वेश्वरैया ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा गांव के प्राइमरी स्कूल से प्राप्त की। विश्वेश्वरैया 'चिक्बल्लापुर' के मिडिल व हाईस्कूल में पढ़े। आगे की शिक्षा के लिए उन्हें बैंगलोर जाना पड़ा। आर्थिक संकटों से जुझते हुए उन्होंने अपने रिश्तेदारों और परिचितों के पास रहकर और अपने से छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर किसी तरह बड़े प्रयास से अपना अध्ययन ज़ारी रक्खा। 19 वर्ष की आयु में बैंगलोर के कॉलेज से उन्होंने बी.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इस कॉलेज के प्रिंसिपल, जो एक अंग्रेज़ थे, विश्वेश्वरैया की योग्यता और गुणों से बहुत प्रभावित थे। उन्हीं प्रिंसिपल साहेब के प्रयास से उन्हें पूना के इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश मिल गया। अपनी शैक्षिक योग्यता के बल पर उन्होंने छात्रवृत्ति प्राप्त करने के साथ साथ पूरे मुम्बई विश्वविद्यालय में सर्वोच्च अंक प्राप्त कर इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की। सन् 1875 में विश्वेश्वरैया ने 'सेन्ट्रल कॉलेज' में प्रवेश लिया। उनके मामा उन्हें मैसूर राज्य सरकार के एक उच्च अधिकारी 'मुडइया' के पास ले गये। मुडइया के दो छोटे बच्चे थे। बच्चों को पढ़ाने के लिए विश्वेश्वरैया को रख लिया गया। उन्होंने अपने संरक्षक का धन्यवाद दिया। उन्होंने तुरन्त ही कार्य आरम्भ कर दिया। प्रतिदिन वह अपने मामा के घर से अपने कॉलेज और मुडइया के घर आने-जाने के लिए पन्द्रह किलोमीटर से ज़्यादा चलते। बाद में जब उनसे अच्छे स्वास्थ्य का रहस्य पूछा गया, तो उन्होंने कहा, 'मैंने चलकर अच्छा स्वास्थ्य पाया है।' अपने काम में उन्होंने अपनी समस्त मुश्किलों का मरहम पाया। ईमानदारी और निष्ठा से उन्होंने अपने कार्य को आभा प्रदान की। इससे 'सेन्ट्रल कॉलेज' के प्रिंसिपल चार्ल्स का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हुआ। जब विश्वेश्वरैया ने जटिल गणितीय समस्याओं का सरल समाधान कर दिया तो प्रिंसिपल ने उनसे कक्षा के अन्य छात्रों को यह समाधान सिखाने को कहा। इससे विश्वेश्वरैया का आत्मविश्वास बढ़ा।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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