महारास  

महारास भगवान श्रीकृष्ण से सम्बंधित है। सोलह कलाओं से परिपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण का अवतार मुख्यत: आनंद प्रधान माना जाता है। उनके आनंद भाव का पूर्ण विकास उनकी मधुर रस लीला में हुआ है। यह मधुर रस लीला उनकी दिव्य रास क्रीड़ा है, जो श्रृंगार और रस से पूर्ण होते हुए भी इस स्थूल जगत् के प्रेम व वासना से मुक्त है। इस रासलीला में वे अपने अंतरंग विशुद्ध भक्तों[1] के साथ शरत् की रात्रियों में विलास करते हैं। कृष्ण की इस रासलीला में दो धाराएं हैं, जो दोनों ओर से आती हैं और एकाकार हो जाती हैं। हर क्षण नया मिलन, नया रूप, नया रस और नई तृप्ति- यही प्रेम-रस का अद्वैत स्वरूप है और इसी का नाम 'रास' है।[2]

श्रीमद्भागवत के दसवें भाग के 29वें अध्याय के प्रथम श्लोक में लिखा है- "भगवानपि ता रात्री: शरदोत्फुल्लमिलका।" जो यह संकेत करता है कि भगवान के साथ रासलीला के लिए जीवात्मा का दिव्य शरीर और दिव्य मन होना अनिवार्य है। दूसरे शब्दों में, इस मधुर रस लीला में शुद्ध जीव का ब्रह्म से विलासपूर्ण मिलन है, जिसमें लौकिक प्रेम व काम अंशमात्र भी नहीं है। शुद्ध जीव का अर्थ है- माया के आवरण से रहित जीव। ऐसे जीव का ही ब्रह्म से मिलन होता है। इसीलिए गोपियों के साथ श्रीकृष्ण ने महारास से पूर्व 'चीरहरण' की लीला की थी। जीवात्मा का परमात्मा के सामने कोई पर्दा नहीं रह सकता। पर्दा माया में ही है। पर्दा होने से वासना और अज्ञान आत्मा को ढक देते हैं और परमात्मा को दूर करते हैं। चीरहरण से गोपियों का उक्त मोह भंग हुआ। जीव का ब्रह्म से मिलन सहज नहीं होता। वह जब परमात्मा के निकट पहुंचता है, तब वे उससे पूछते हैं- मेरे पास क्यों आया है? जैसे कृष्ण ने गोपियों से कहा- "कहो, कैसे आना हुआ इस घोर रात्रि में? अपने पति, पुत्र, सगे-सम्बन्धी, गुरु और प्रियजनों की सेवा करना तुम्हारा धर्म है। तुम लौट जाओ अपने घर।" गोपियां स्वर्ग-मोक्ष-काम आदि से रहित हैं। उन्होंने उत्तर दिया- "पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद , याम: कथं ब्रजमधो करवाम किं वा।।"[3] अर्थात "हे गोविन्द! हमारे पांव आपके चरण-कमलों को छोड़कर एक पग भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। हम ब्रज को लौटें तो कैसे ? और यदि हम लौटें भी तो मन के बिना वहां हम क्या करें ? तब कृष्ण ने अपने अंतिम प्रश्न में गोपियों को उनके संतान मोह की ओर इशारा करते हुए कहा- "तो क्या तुम्हें अपने पुत्रों का भी मोह नहीं है ?" गोपियों का उत्तर था- "हे मोहन! आप में ही हमारा मोह सर्वोपरि है, क्योंकि पुत्रादि में भी आप ही स्थित हैं। ऐसी कौन सी वस्तु है, जो आपसे अलग है?[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. जो उनकी निज रसरूपा राधा की सोलह हजार कायरूपा गोपियां हैं।
  2. 2.0 2.1 प्रेम का ही अद्वैत स्वरूप है कृष्ण का महारास (हिन्दी) speakingtree.in। अभिगमन तिथि: 8 मार्च, 2016।
  3. श्रीमद्भागवत्- 10.29.34
  4. सृष्टि के रचयिता

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