ब्राह्मण साहित्य  

(ब्राह्मण ग्रन्थ से पुनर्निर्देशित)


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यज्ञों एवं कर्मकाण्डों के विधान एवं इनकी क्रियाओं को भली-भांति समझने के लिए ही इस ब्राह्मण ग्रंथ की रचना हुई। यहाँ पर 'ब्रह्म' का शाब्दिक अर्थ हैं- यज्ञ अर्थात् यज्ञ के विषयों का अच्छी तरह से प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ ही 'ब्राह्मण ग्रंथ' कहे गये। ब्राह्मण ग्रन्थों में सर्वथा यज्ञों की वैज्ञानिक, अधिभौतिक तथा अध्यात्मिक मीमांसा प्रस्तुत की गयी है। यह ग्रंथ अधिकतर गद्य में लिखे हुए हैं। इनमें उत्तरकालीन समाज तथा संस्कृति के सम्बन्ध का ज्ञान प्राप्त होता है। प्रत्येक वेद (संहिता) के अपने-अपने ब्राह्मण होते हैं। ब्राह्मण ग्रन्थो से हमें परीक्षित के बाद और बिम्बिसार के पूर्व की घटनाओं का ज्ञान प्राप्त होता है। 'ऐतरेय ब्राह्मण' में 'राज्याभिषेक' के नियम दिये गये हैं। प्राचीन इतिहास के साधन के रूप में 'वैदिक साहित्य' में 'ऋग्वेद' के बाद 'शतपथ ब्राह्मण' का स्थान है। शतपथ ब्राह्मण में गंधार, शल्य, कैकेय, कुरू, पांचाल, कोशल, विदेश आदि राजाओं के नाम का उल्लेख है।

वेद और संबंधित ब्राह्मण

वेद सम्बन्धित ब्राह्मण

1- ऋग्वेद

ऐतरेय ब्राह्मण, शांखायन या कौषीतकि ब्राह्मण

2- शुक्ल यजुर्वेद

शतपथ ब्राह्मण

3- कृष्ण यजुर्वेद

तैत्तिरीय ब्राह्मण

4- सामवेद

पंचविंश या ताण्ड्य ब्राह्मण, षडविंश ब्राह्मण, सामविधान ब्राह्मण, वंश ब्राह्मण, मंत्र ब्राह्मण, जैमिनीय ब्राह्मण

5- अथर्ववेद

गोपथ ब्राह्मण

पृष्ठभूमि

उत्तर वैदिककाल में, जब वैदिक संहिताएँ धीरे-धीरे दुर्बोध होती चली गईं, मन्त्रार्थ-ज्ञान केवल कुछ विशिष्ट व्यक्तियों तक सीमित रह गया, उस समय यह आवश्यकता गहराई से अनुभव की गई कि वेद-मन्त्रों की विशद व्याख्या की जाय्। यही स्थिति वैदिक-यज्ञों के कर्मकाण्ड की भी थी। सुदीर्घकाल तक यागों का अनुष्ठान मौखिक ज्ञान के आधार पर ही होता रहा, लेकिन शनै:शनै यज्ञ-विधान जब जटिल और संश्लिष्ट प्रतीत होने लगा तथा स्थान-स्थान पर सन्देह और शंकाओं का प्रादुर्भाव होने लगा, तब इस सन्दर्भ में स्थायी आधार की आवश्यकता अनुभव हुई। ब्रह्मवादियों (यज्ञवेत्ताओं) के मध्य यागीय विसंगतियों के निराकरण के लिए सम्पन्न चर्चा-गोष्ठियों, परिसंवादों तथा सघन विचार-विमर्श ने ब्राह्मण-ग्रन्थों के प्रणयन का मार्ग विशेष रूप से प्रशस्त किया। किसी भी युग के साहित्य के मूल में, तत्कालीन सांस्कृतिक विचारधारा, राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता, आस्थाओं, आदर्शों एवं मूल्यों की अभिव्यक्ति का दुर्निवार्य आग्रह स्वभावत: सत्रिहित रहता है। ब्राह्मण-साहित्य के अन्तर्दर्शन की पृष्ठभूमि में भी, निश्चित ही यह आकांक्षा निहित रही है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि वेद-मन्त्रों की सुगम व्याख्या करने, यज्ञीय विधि-विधान के सूक्ष्मातिसूक्ष्म पक्षों को निरूपित करने तथा समकालीन वैचारिक आन्दोलन को दिशा देने की भावना मुख्य रूप से ब्राह्मण ग्रन्थों के साक्षात्कार की पृष्ठभूमि में निहित रही है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. जैमनीय मीमांसा सूत्र, 2.1.33
  2. मन्त्रश्च ब्राह्मणश्चेति द्वौ भागौ तेन मन्त्रत:। अन्यद् ब्राह्मणमित्येतद् भवेद् ब्राह्मणलक्षणम्। जैमिनि न्यायमाला, 2.1, 'अवशिष्टो वेदभागो ब्राह्मणम्' ऋग्वेद भाष्य भूमिका पृष्ठ 37
  3. ब्राह्मणं ब्रह्मसंघाते वेदभागे नपुंसकम् मेदिनीकोश।
  4. य इमे ब्राह्मणा: प्रोक्ता मन्त्रा वै प्रोक्षणे गवाम्। एते प्रमाणं उताहो नेति वासव्। महाभारत, उद्योग पर्व महाभारत, भाण्डारकर-संस्करण।
  5. एतद् ब्राह्मणान्येव पञ्च हर्वीषि, तैत्तिरीय संहिता, 3.7.1.1
  6. पाणिनीय, 3.4.3.6
  7. निरुक्त, 4.27
  8. ब्रह्म वै मन्त्र:-शतपथ ब्राह्मण, 7.1.1.5; वेदों ब्रह्म-जैमिनी उपनिषद ब्राह्मण, 4.11.3
  9. ऐतरेयालोचन, पृष्ठ 2
  10. ब्राह्मणं नाम कर्मणस्तन्मन्त्राणां च व्याख्यानग्रन्थ:। भत्तभास्कर, तैत्तिरीय संहिता 1.5.1 पर भाष्य
  11. नैरुक्त्यं यस्य मन्त्रस्य विनियोग: प्रयोजनम्। प्रतिष्ठानं विधिश्चैव ब्राह्मणं तदिहोच्यते। 'वाचस्पति मिश्र'
  12. स्वामी दयानन्द सरस्वती, अनुभ्रमोच्छेदन, सत्यार्थप्रकाश, पृष्ठ 288 (बहालगढ़ संस्करण, सं 2029), 'तत्तन्मन्त्राणां तत्तद्यागाद्युपयोगित्वं वर्णयितुं समासतस्तात्पय्र्यमन्वाख्यातुं वा व्याख्यानानि च कृतानि। ततश्च विध्यर्थवादाख्यानपूर्वकमादिमं मन्त्र-भाष्यं ब्राह्मणामित्येव पर्यवस्यते ब्राह्मणलक्षणम्। 'ऐतरेयालोचन', पृष्ठ 11
  13. इस सन्दर्भ में कुछ कथन ये हैं-
    (क) मन्त्रब्राह्मणयोर्वेद इति नामधेयं षडंगमेके। 'तन्त्रवार्तिक' 1.3.10
    (ख) वेदों मन्त्रब्राह्मणाख्यो मन्त्रराशि:।
    (ग) तत्र ब्राह्नणात्मको वेद:। 'तैत्तिरीय संहिता, सायण-भाष्योपक्रमणिका।
  14. ब्राह्मण ग्रन्थों की श्रुतिरूपता पर आचार्य पंण्डित बलदेव उपाध्याय ने वैदिक साहित्य और संस्कृति में विस्तार से विचार किया है। इसमें उन्होंने मनुस्मृति, दार्शनिक सूत्रकारों, पाणिनीय अष्टाध्यायी, व्याकरण महाभाष्य और अन्य आचार्यों के मतों की विशद मीमांसा करते हुए ब्राह्मणों की वेदरूपता का युक्तियुक्त उपपादन किया है।
  15. सूत्र 35
  16. जैमनीय मीमांसासूत्र 1.2.27
  17. शाबरभाष्य 2.1.11
  18. शतपथ ब्राह्मण 2.5.2.23
  19. तैत्तिरीय संहिता 5.3.3
  20. तैत्तिरीय संहिता 5.1.8.1
  21. तैत्तिरीय संहिता 2.1.1.1
  22. तैत्तिरीय संहिता 6.5.9.1
  23. तैत्तिरीय संहिता 6.2.10.3
  24. तैत्तिरीय संहिता 6.2.10.3
  25. तैत्तिरीय संहिता 1.5.7.5
  26. तैत्तिरीय संहिता 2.3.12.1
  27. छान्दोग्य उपनिषद 6.8.2
  28. पञ्चर्त्विज: संरब्धा सर्पन्ति पाङ्क्तो यज्ञो यावान् यज्ञस्तमेव सन्तन्वन्ति। तैत्तिरीय ब्राह्मण, 6.7.12
  29. उदुम्बर वृक्ष की शाखा
  30. ताण्डय ब्राह्मण, 6.5.1- में वर्णित यह आख्यायिका किंचित् परिवर्तित रूप में जैमिनीय ब्राह्मण तथा शतपथ ब्राह्मण में भी मिलती है। जैमिनीय ब्राह्मण में आदित्य के स्थान पर अग्नि का उल्लेख है और शतपथ ब्राह्मण में देवों के द्वारा वृत का शिर काटने का निर्देश है: वृत्रो वै सोम आसीत्। तं यत्र देवा अपघ्नन् तस्य मूद्धोद्ववर्त, स द्रोणकलशोऽभवत्, शतपथ ब्राह्मण 4.4.3.4
  31. एष वाव यज्ञो यदग्निष्टोम:। एकस्मा अन्यो यज्ञ: कामायाह्रियते सर्वेभ्योऽग्निष्टोम:। ताण्डय ब्राह्मण, 6.3.1-2
  32. एतद्वै यज्ञस्य समृद्धं यद्रूपसमृद्धं यत्कर्मक्रियामाणमृग्यजुर्वाऽभिवदति। -गोपथब्राह्मण 2.4.2
  33. तांण्डय ब्राह्मण (6.10.4
  34. साम. 220

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