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ब्रजभाषा साहित्य का इतिहास (काल विभाजन) - भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर

ब्रजभाषा साहित्य का इतिहास (काल विभाजन)  

ब्रजभाषा साहित्य के इतिहास को तीन चरणों में बाँटा जा सकता है। इसका उदयकाल जिसके ऊपर 'नागर' अपभ्रंश काव्य की छाप है। इसी कारण उसमें दिखने वाले हिन्दी के मध्य देश में पैदा हुए अमीर ख़ुसरो से लेकर महाराष्ट्र में पैदा हुए महानुभाव और ज्ञानेश्वर के साथी नामदेव हैं। दूसरी ओर पंजाब से लेकर बिहार तक के सन्त कवि हैं, जो भिन्न-भिन्न प्रयोजनों से भिन्न-भिन्न प्रकार की भाषा का व्यवहार करते हैं, परन्तु गेय प्रयोजन के लिए प्राय: ब्रजभाषा का ही व्यवहार करते हैं। इनकी सूची बड़ी लम्बी है और पन्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के अधिकांश सन्त-कवि साहित्यिक ब्रजभाषा का ही प्रयोग करते हैं। मुख्य नाम ये हैं-कबीर, रैदास, धर्मदास और गुरु नानक, दादू दयाल और सत्रहवीं शताब्दी के सुन्दरदास, मलूकदास और अक्षरअनन्य हैं।

सूफ़ी काव्य का बीच रूप भी जिस काव्य से मिलता है, वह मुल्लादाउद का चन्दायन नहीं है, वह साधन का ‘मैनासत’ है, जिसकी भाषा ग्वालियरी है और वह कुछ और नहीं ब्रजभाषा ही है। कुछ विद्वान् ब्रजभाषा का पुराना नाम 'ग्वालियरी' ही देते हैं। ‘मैनासत’ का रचना काल पन्द्रहवीं शताब्दी है। यह उल्लेखनीय है कि, इस कोटि के कवियों की भाषा बहुत परिमार्जित नहीं है, न उसमें वक्र-भंगिमाओं के लिए कोई विशेष स्थान है। उदाहरण के लिए नामदेव ने इस छन्द में बहुत सीधे-साधे ढंग से लीला का कीर्तन किया है-

अम्बरीष कौ दियौ अभय पद, राज विभीषन अधिक करयो।
नवनिधि ठाकुर दई सुदामहि, ध्रुव जो अटल अजहूँ न टरयो।
भगत हेत मारयो हरिनाकुस, नृसिंह रूप ह्वै देह धरयो।
नामा कहै भगति बस केसव, अजहूँ बलि के द्वार खरौ।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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