प्रशासनिक हिन्दी का विकास -डॉ. नारायणदत्त पालीवाल  

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लेखक- डॉ. नारायणदत्त पालीवाल

          हमारे देश में काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक तथा गुजरात से लेकर नागालैंड तक अनेक भाषाएँ, उपभाषाएँ, बोलियाँ तथा उपबोलियाँ बोली जाती है। इनमें विभिन्नता के होते हुए भी एकता के दर्शन होते हैं। प्राचीन काल से भावनात्मक एकता के संदेश के साथ साथ भारतीय साहित्य में देश की सांस्कृतिक गरिमा, यहाँ की सभ्यता, यहाँ के आदर्श और जीवन के शाश्वत मूल्यों, यहाँ की सभ्यता, यहाँ के आदर्श और जीवन के शाश्वत मूल्यों को समान रूप से वाणी मिली है। यही कारण है कि सभी भारतीय भाषाएँ भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में इस धरती पर सांस्कृतिक एकता की पावन गंगा प्रवाहित करती है। भाषा मानव को मानव से जोड़ती है। यह विचारों के आदान प्रदान में सहायक होने के साथ साथ परंपराओं, संस्कृतियों और मान्यताओं तथा विश्वासों को समझने का माध्यम भी हे। प्राचीनकाल से ही विभिन्न भाषाएँ इस देश में पारस्परिक स्नेह, भाई-चारे की भावना तथा सांस्कृतिक एकता और अखंडता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमका निभाती रही है। इस विचार से देखा जाए तो संस्कृत, हिन्दी तथा भारतीय संविधान में मान्यता प्राप्त अन्य प्रदेशिक भाषाएँ इस देश की सामासिक संस्कृति के विकास के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

हिन्दी के विकास में संस्कृत की भूमिका

संस्कृत भाषा के विषय में संस्कृत के प्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वान् मोनियर विलियम ने कहा है कि ‘यद्यपि भारत में पाँच सौ से अधिक बोलियाँ प्रचालित है, परंतु हिन्दुत्व को मानने वाले सभी व्यक्तियों के लिए, चाहे वे कितनी जाति, कुल, मर्यादा, संप्रदाय और बोलियों की भिन्नताओं के क्यों न हो, सर्वसम्मति से स्वीकृत और समादूत एक ही पवित्र भाषा और साहित्य है और वह भाषा है - संस्कृत और वह साहित्य है - संस्कृत साहित्य[1]। इसे किसी काल और सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। संस्कृत को विश्व की 3 प्राचीन महान् भाषाओं में गिना जाता हे। यदि पिछली कई शताब्दियों के इतिहास पर दृष्टि डालें तो हमें ज्ञात होगा कि जब देश छोटे छोटे राज्यों और प्रांतों में बँटा था तो संस्कृत को कार्य व्यवहार के लिए महत्वपूर्ण भाषा के रूप में अपनाया गया था। भारत की प्रादेशिक भाषाएँ भी संस्कृत के प्रभाव के अंतर्गत रही है। अनेक सरकारी लेखपत्रों, कानूनों नियमों तथा सरकार और नागरिकों से संबंधित अनेक अभिलेखों का संस्कृत में पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि प्रशासनिक कार्यों में इस भाषा का प्राचीन काल में प्रचलन था। इसके अतिरिक्त यह भाषा हमारे धर्मग्रंथों तथा शैक्षिणिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक साहित्य की प्राण रही है। हिन्दी साहित्य की अनेक कृतियों पर संस्कृत का प्रभाव स्पष्ट है। हिन्दी के आदिकाल को ही लिया जाए तो उससे पहले की भाषा अपभ्रंश पर भी संस्कृत का व्यापक प्रभाव रहा है। जहाँ तथा प्रशासनिक हिन्दी का प्रश्न है स्वतंत्रता से पूर्व अनेक रियासतों का कामकज अंग्रेजी में न होकर हिन्दी में चलता था। 1000 ई. के बाद मुसलमानों के आगमन पर अवश्य ही संस्कृत का प्रयोग समाप्त हो गया और प्रशासनिक भाषा पर अरबी-फारसी का प्रभाव पड़ा तथा मुसलमान शासकों के समय सरकार, तहसीलदार, वकील, चपरासी, सिपाही अमीन, जिला, दफ्तरी, खजांची, माल कमान आदि के समान शब्द सरकारी कामाकज में प्रचलित हो गये जो आज भी लोकप्रिय हैं और बराबर प्रयोग में आ रहे हैं।
यह परिवर्तन स्वाभाविक भी था क्योंकि बदली हुई परिस्थितियों तथा ज्ञान और विज्ञान की विकसित अवस्था के साथ साथ कोई भी जीवंत भाषा नए शब्दों और अर्थों को अपनाती है। इस प्रकार सरकारी कामकाज की हो या सामान्य जनता के प्रयोग की, किसी भी भाषा को नई दिशा मिलती रहती है। अंग्रेजी राज्य के दौरान शिक्षा, ज्ञान विज्ञान और राजनीति के क्षेत्र में परिवर्तन हुए। अतः नये आयाम और नई दिशाओं को वाणी देने के लिए भाषा भी अपने रूप को उसी के अनुकूल परिवर्तित करती गई है। जहां तक शब्दावली का प्रश्न है भाषा में संस्कृत, अंग्रेजी, अरबी, फारसी और उर्दू के शब्द खपते चले गये। अंग्रेजी ने अपने शासन की सुविधा के लिए हिन्दी और संस्कृत के शब्दों को भी अपनाया। इसीलिए मुकदमा, गवाह, खारिज, पेशी तथा अर्जी जैसे शब्दों के साथ साथ समन, जज, वारंट तथा एडवोकेट जैसे शब्द भी आम प्रचलन में आ गए।

हिन्दी का राष्ट्रव्यापी रूप

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. मोनियर विलियम, हिंदुइज्म, (के.एम.मुंशी द्वारा संपादित 'इंडिया इन हैरिटेंस' जिल्द 2, पृ. 91 राधाकुमुद मुखर्जी द्वारा उद्धृत

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