पंढरपुर  

पंढरपुर
पंढरपुर, महाराष्ट्र
विवरण 'पंढरपुर' हिन्दुओं का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। भगवान विष्णु के अवतार 'विठोबा' और उनकी पत्नी रुक्मिणी के सम्मान में इस शहर में वर्ष में चार बार त्योहार मनाए जाते हैं।
राज्य महाराष्ट्र
ज़िला शोलापुर
भौगोलिक स्थिति शोलापुर से 38 मील पश्चिम की ओर चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित।
प्रसिद्धि हिन्दू तीर्थ स्थल
कब जाएँ पंढरपुर में ग्रीष्म और शीत दोनों ही मौसम का पूरा प्रभाव रहता है। यहां कभी भी आया जा सकता है।
कैसे पहुँचें यहाँ पहुँचने के लिए रेलमार्ग, सड़कमार्ग तथा वायुमार्ग तीनों की व्यवस्था है।
हवाई अड्डा पुणे, मुम्बई
रेलवे स्टेशन कुर्दुवादि
क्या देखें 'विट्ठल मंदिर', 'रुक्मिणीनाथ मंदिर', 'पुंडलिक मंदिर', 'लखुबाई मंदिर', 'पद्मावती मंदिर', 'अंबाबाई मंदिर' और 'लखुबाई मंदिर' आदि।
संबंधित लेख महाराष्ट्र, महाराष्ट्र पर्यटन, महाराष्ट्र का इतिहास, शोलापुर, पंढरपुर यात्रा, देवगिरि का यादव वंश
प्रशासकीय भाषा कन्नड़, मराठी
अन्य जानकारी मान्यताओं के अनुसार भक्त पुंडलीक के स्मारक के रूप में यहाँ का मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर में विठोबा के रूप में श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है।

पंढरपुर महाराष्ट्र राज्य का एक नगर और प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। यह पश्चिमी भारत के दक्षिणी महाराष्ट्र राज्य में भीमा नदी[1] के तट पर शोलापुर नगर के पश्चिम में स्थित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भक्तराज पुंडलीक के स्मारक के रूप में यहाँ का मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर में विठोबा के रूप में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है।

धार्मिक स्थल

शोलापुर से 38 मील (लगभग 60.8 कि.मी.) पश्चिम की ओर चंद्रभागा अथवा भीमा नदी के तट पर महाराष्ट्र का शायद यह सबसे बड़ा तीर्थ है। 11वीं शती में इस तीर्थ की स्थापना हुई थी। सड़क और रेल मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचने योग्य पंढरपुर एक धार्मिक स्थल है, जहाँ साल भर हज़ारों हिंदू तीर्थयात्री आते हैं। भगवान विष्णु के अवतार 'बिठोबा' और उनकी पत्नी 'रुक्मिणी' के सम्मान में इस शहर में वर्ष में चार बार त्योहार मनाए जाते हैं। मुख्य मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में देवगिरि के यादव शासकों द्वारा कराया गया था। यह शहर भक्ति संप्रदाय को समर्पित मराठी कवि संतों की भूमि भी है।

मुख्य मंदिर

श्री विट्ठल मंदिर यहाँ का मुख्य मंदिर है। यह मंदिर बहुत विशाल है। निज मंदिर में श्रीपुण्डरीनाथ कमर पर हाथ रखे खड़े हैं। उसी घेरे में ही रुक्मिणीजी, बलरामजी, सत्यभामा, जाम्बवती तथा श्रीराधा के मंदिर हैं। मंदिर में प्रवेश करते समय द्वार के समीप भक्त चोखामेला की समाधि है। प्रथम सीढ़ी पर ही नामदेवजी की समाधि है। द्वार के एक ओर अखा भक्ति की मूर्ति है।

पौराणिक कथा

भक्त पुण्डरीक माता-पिता के परम सेवक थे। वे माता-पिता की सेवा में लगे थे, उस समय श्रीकृष्णचंद्र उन्हें दर्शन देने पधारे। पुण्डरीक पिता के चरण दबाते रहे। भगवान को खड़े होने के लिए उन्होंने ईंट सरका दी; किंतु उठे नहीं। भगवान कमर पर हाथ रखे ईंट पर खड़े रहे। सेवा से निवृत्त होने पर पुण्डरीक ने भगवान से इसी रूप में यहाँ स्थित रहने का वरदान मांग लिया[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. यहाँ भीमा नदी अपने घुमावदार बहाव के कारण 'चन्द्रभागा' कहलाती है।
  2. हिन्दूओं के तीर्थ स्थान |लेखक: सुदर्शन सिंह 'चक्र' |पृष्ठ संख्या: 188 |
  3. = 1081 ई.
  4. = 1117 ई.
  5. (मराठी वांड्मया च्या इतिहास, प्रथम खंड, पृष्ठ 334-351)
  6. इसे रुक्मिणी मंदिर के नाम से जाना जाता है
  7. पंढरपुर यात्रा में श्रद्धालु करते हैं भगवान विट्ठल का दर्शन (हिन्दू) आज तक। अभिगमन तिथि: 04 अप्रैल, 2015।

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