नागार्जुनकोंडा  

नागार्जुनकोंडा आंध्र प्रदेश राज्य के गुंटूर ज़िले में स्थित एक ऐतिहासिक नगर है। यहाँ का स्तूप 1926 ई. में खोजा गया था। हैदराबाद से 100 मील (लगभग 160 कि.मी.) दक्षिण-पूर्व की ओर यह एक अति प्राचीन नगर है। यह बौद्ध धर्म की महायान शाखा के प्रसिद्ध आचार्य नागार्जुन (दूसरी शती ई.) के नाम पर प्रसिद्ध है। प्रथम शताब्दी में यहाँ सातवाहन नरेशों का राज्य था। 'हाल' नामक सातवाहन राजा ने आचार्य नागार्जुन के लिए श्रीपर्वत शिखर पर एक विहार बनवाया था। नागार्जुनकोंडा से प्राप्त अभिलेखों से यह ज्ञात होता है कि पहली शताब्दी ई. में भारत का चीन और यूनानी जगत् तथा लंका से सम्बन्ध स्थापित था।[1]

इतिहास

प्रथम शती ई. में तथा उसके पूर्व नागार्जुनकोंडा का नाम 'श्रीपर्वत' था, जिसका वर्णन महाभारत, वनपर्व, तीर्थ यात्रा के प्रसंग में है-

'श्रीपर्वतमासाद्य नदीतीरमुपस्पृशेत्'[2]

श्रीमद्भागवत[3] में भी श्रीशैल या श्रीपर्वत का उल्लेख है-

'देवगिरि र्ऋष्यमूक: श्रीशैलो वैंकटो महेन्द्रो वारिधारो विंध्य:'।

प्रथम शती ई. में यहाँ सातवाहन नरेशों का राज्य था। 'हाल' नामक शातवाहन राजा ने जो प्राकृत के प्रसिद्ध काव्य 'गाथासप्तमी' के रचयिता कहे जाते हैं, नागार्जुन के लिए श्रीपर्वत शिखर तक एक विहार बनवा दिया था, यहाँ ये रसविद् आचार्य अपने जीवन के अंतकाल में रहे थे। उनके यहाँ रहने के कारण यह स्थान महायान बौद्ध धर्म का केन्द्र बन गया। जिससे भारत तथा बृहत्तर भारत में महायान के प्रचार में योगदान मिला। उस समय यहाँ एक बौद्ध महाविद्यालय स्थापित हो गया था। नागार्जुन का नाम तिब्बत तथा चीनी बौद्ध साहित्य में भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि तीसरी या चौथी शती ई. में एक अन्य तांत्रिक विद्वान् नागार्जुन भी यहाँ रहे थे। सातवाहनों (आंध्र नरेशों) के पश्चात् नागार्जुनकोंडा में इक्ष्वाकु नरेशों ने राज्य किया और वे आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती से यहीं ले आए। उस समय नागार्जुनकोंडा को 'विजयपुर' या 'विजयपुरी' कहते थे। इक्ष्वाकु नरेश हिन्दू मतावलंबी होते हुए भी बौद्ध धर्म के संरक्षक थे, यहाँ तक कि कई राजाओं की रानियाँ बौद्ध थीं और इस मत के प्रचार में क्रियात्मक रूप से भाग लेती थीं। संसार के इतिहास में धार्मिक सहिष्णुता का यह अपूर्व उदाहरण है।

नगर की सुन्दरता

नागार्जुनकोंडा (विजयपुर) इक्ष्वाकुओं के शासन काल में बहुत सुंदर नगर था। कृष्णा नदी के तट पर स्थित तथा चतुर्दिक पर्वत मालाओं से परिवृत यह नगर प्राकृतिक सौंदर्य से समन्वित होने के साथ ही दुर्भेद्य दुर्ग की भांति सुरक्षित भी था। विजयपुर के आस्थान से नौ बौद्ध स्तूपों के खंडहर लगभग चालीस वर्ष पूर्व उत्खनित किए गए थे, जो इस नगर के प्राचीन गौरव तथा ऐश्वर्य के साक्षी हैं। आठवीं शती में बौद्ध धर्म को, अन्य कारणों के अतिरिक्त महामनीषी शंकराचार्य के प्राचीन हिन्दू धर्म के पुनर्रजीवन के लिए किए गए भागीरथ प्रयत्न के परिणामस्वरूप बड़ा धक्का लगा और इसकी दक्षिण भारत में अवनति के साथ ही नागार्जुनकोंडा का महत्त्व भी घटने लगा।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |पृष्ठ संख्या: 488 |
  2. महाभारत, वनपर्व, 85, 11.
  3. श्रीमद्भागवत 5, 18, 16
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