दीना पाठक  

दीना पाठक
दीना पाठक (एक फिल्म के दृश्य में)
पूरा नाम दीना पाठक
जन्म 4 मार्च, 1922
जन्म भूमि अमरेली, गुजरात
मृत्यु 11 अक्टूबर, 2002
मृत्यु स्थान बांद्रा, मुम्बई
पति/पत्नी बलदेव पाठक
संतान सुप्रिया पाठक और रत्ना पाठक
कर्म-क्षेत्र सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'मौसम', 'किनारा', 'किताब', 'चितचोर', 'घरौंदा', 'गोलमाल', 'खूबसूरत' आदि।
पुरस्कार-उपाधि संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी वर्ष 2000 में, 78 साल की उम्र में भी, दीना पाठक ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ इण्डियन विमेन’ जैसे भारतीय स्तर के महिला संगठन की अध्यक्षा थीं।

दीना पाठक (अंग्रेज़ी: Dina Pathak; जन्म: 4 मार्च, 1922, गुजरात; निधन: 11 अक्टूबर, 2002) हिन्दी फ़िल्मों की अभिनेत्री थीं। उनकी प्रसिद्ध फिल्मों में 'मौसम', 'किनारा', 'किताब', 'चितचोर', 'घरौंदा', 'गोलमाल', 'खूबसूरत' आदि शामिल हैं। दीना पाठक ने अपने कॅरियर की अधिकतर फिल्में आर्ट निर्देशकों के साथ कीं। ऐसा इसलिए क्यूंकि वह थियेटर जगत् से जुड़ी थीं और कमर्शियल फिल्मों की चमक-दमक उन्हें पसंद नहीं थी। भारतीय सिनेमा जगत् में दीना पाठक ने ना सिर्फ अभिनय के क्षेत्र में अपना डंका बजाया बल्कि उन्होंने थियेटर जगत् को सिनेमा के साथ जोड़ने में बेहद अहम भूमिका निभाई। आज़ादी से पहले महिलाओं का रंगमंच से जुड़ाव बेहद कम होता था। ऐसे समय में भी दीना पाठक ने रंगमंच को अपनी कर्मभूमि बनाया और उसमें सफलता हासिल करने की कोशिश की। अंग्रेज़ों से लड़ाई की जंग में दीना पाठक ने भी अपना योगदान दिया। उन्होंने नुक्कड़ और नाटकों द्वारा जनता को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एकजुट होने की अपील की। गुजराती थियेटर को अपनी पहचान दिलाने में दीना पाठक का बेहद अहम योगदान रहा है। 1940 से ही दीना पाठक गुजराती थियेटरों में काम करने लगीं थीं। दीना पाठक की बेटियां रत्ना पाठक और सुप्रिया पाठक भी हिन्दी कला जगत् की चर्चित अभिनेत्री हैं। दोनों ने ही अधिकतर हास्य प्रधान टीवी कार्यक्रमों में अपनी छाप छोड़ी है। 80 के दशक के सबसे चर्चित टीवी शो 'मालगुड़ी डेज' में भी दीना पाठक नजर आईं। दीना पाठक की आख़िरी फिल्म साल 2003 की 'पिंजर' थी।[1]

जीवन परिचय

दीना पाठक का जन्म गुजरात के अमरेली में 4 मार्च, 1922 को हुआ था और उनके पिताजी सिविल इन्जिनीयर थे। उनकी परवरिश पूना और बम्बई में भी हुई थी। इसलिए वे मराठी भी अच्छी बोल लेतीं थीं। उनके पढ़ाई के दिनों में आज़ादी का आंदोलन अपने ज़ोरों पर था। इस लिये उन दिनों शेरी नाटक का भी खूब चलन था। दीना जी, यानी उस समय की दीना गांधी, भी उनमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती थीं। वे खासकर महिला जागृति के लिए कार्यशील थीं। विविध आंदोलनों का हिस्सा होने की वज़ह से उन्होंने कारावास भी सहा था। उनकी बड़ी बहन शांता गांधी तथा छोटी बहन तरला भी थियेटर से जुड़ी थीं। शांता गांधी नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में भी प्रवृत्त थीं। जबकि तरला तो बाद में धर्मेन्द्र की आरंभिक फ़िल्म ‘शोला और शबनम’ की नायिका भी बनी थीं।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. इन्हें देख आती थी दादी की याद (हिन्दी) जागरण जंक्शन। अभिगमन तिथि: 24 नवंबर, 2016।
  2. 2.0 2.1 2.2 2.3 2.4 दीना पाठक: एक प्रतिभावंत कलाकार और आजीवन बागी महिला कार्यकर्ता भी! (हिन्दी) द हिन्दी टाइम्स। अभिगमन तिथि: 24 नवंबर, 2016।

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