दास प्रथा  

दास प्रथा
दास प्रथा
विवरण दास प्रथा के द्वारा प्राय: ऋणग्रस्त अथवा युद्धों में बन्दी होने वाले व्यक्तियों को दास बनाया जाता था।
अन्य नाम दासता प्रथा, ग़ुलामी प्रथा
शुरुआत 'दास प्रथा' की शुरुआत कई सदियों पहले ही हो चुकी थी। माना जाता है कि चीन में 18वीं-12वीं शताब्दी ईसा पूर्व 'ग़ुलामी प्रथा' का ज़िक्र मिलता है। भारत के प्राचीन ग्रंथ 'मनुस्मृति' में भी दास प्रथा का उल्लेख किया गया है।
प्रतिबंध सन 1807 में ब्रिटेन ने दास प्रथा उन्मूलन क़ानून के तहत अपने देश में अफ़्रीकी ग़ुलामों की ख़रीद-फ़रोख्त पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी। 1808 में अमेरिकी कांग्रेस ने ग़ुलामों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। वर्ष 1833 तक यह क़ानून पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में लागू कर दिया। भारत में ब्रिटिश शासन के समय 1843 ई. में इस प्रथा को बन्द करने के लिए एक अधिनियम पारित कर दिया गया था।
बंधुआ मज़दूरी दक्षिण एशिया विशेष रूप से भारत, पाकिस्तान और नेपाल में ग़रीबी से तंग लोग ग़ुलाम बनने पर मजबूर हुए। भारत में भी बंधुआ मज़दूरी के तौर पर दास प्रथा जारी है। हालांकि सरकार ने वर्ष 1975 में राष्ट्रपति के एक अध्यादेश के जरिए बंधुआ मज़दूर प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया था, किंतु इसके बावजूद यह सिलसिला आज भी जारी है।
विशेष एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में सबसे ज़्यादा तमिलनाडु में 65 हज़ार 573 बंधुआ मज़दूरों की पहचान कर उन्हें मुक्त कराया गया। कर्नाटक में 63 हज़ार 437 और उड़ीसा में 50 हज़ार 29 बंधुआ मज़दूरों को मुक्त कराया गया।
अन्य जानकारी पूरी दुनिया में आज भी दास प्रथा जैसी अमानवीय प्रथा जारी है और जानवरों की तरह इंसानों की ख़रीद-फ़रोख्त की जाती है। इन ग़ुलामों से कारख़ानों और बाग़ानों में काम कराया जाता है। इसके अलावा ग़ुलामों को वेश्यावृति के लिए मजबूर भी किया जाता है। ग़ुलामों में बड़ी तादाद में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं।

दास प्रथा (अंग्रेज़ी: Slavery) काफ़ी पुराने समय से सिर्फ़ भारत में ही बल्कि दुनिया के कई देशों में व्याप्त रही है। मानव समाज में जितनी भी संस्थाओं का अस्तित्व रहा है उनमें सबसे भयावह दासता की प्रथा है। यद्यपि चौथी शताब्दी ई. पू. में भारत के विषय में मेगस्थनीज ने लिखा था कि "भारतवर्ष में दास प्रथा नहीं है", तथापि कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' तथा मौर्य सम्राट अशोक के अभिलेखों में प्राचीन भारत में 'दास प्रथा' प्रचलित होने के संकेत उपलब्ध होते हैं। दास प्रथा के द्वारा प्राय: ऋणग्रस्त अथवा युद्धों में बन्दी होने वाले व्यक्तियों को दास बनाया जाता था। फिर भी प्राचीन भारत में यूरोप की भाँति दास प्रथा न तो व्यापक थी और न ही दासों के प्रति वैसा क्रूर व्यवहार होता था।

प्रथा का प्रारम्भ

'दास प्रथा' की शुरुआत कई सदियों पहले ही हो चुकी थी। माना जाता है कि चीन में 18वीं-12वीं शताब्दी ईसा पूर्व 'ग़ुलामी प्रथा' का ज़िक्र मिलता है। भारत के प्राचीन ग्रंथ 'मनुस्मृति' में भी दास प्रथा का उल्लेख किया गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार 650 ईस्वी से 1905 ई. के दौरान पौने दो करोड़ से ज़्यादा लोगों को इस्लामी साम्राज्य में बेचा गया। 15वीं शताब्दी में अफ़्रीका के लोग भी इस अनैतिक व्यापार में शामिल हो गए। वर्ष 1867 में क़रीब छह करोड़ लोगों को बंधक बनाकर दूसरे देशों में ग़ुलाम के तौर पर बेच दिया गया। भारत में मुस्लिमों के शासन काल में दास प्रथा में बहुत वृद्धि हुई। यहाँ तक की दासों को नपुंसक तक बना डालने की क्रूर प्रथा का प्रारम्भ हुआ। यह प्रथा भारत में ब्रिटिश शासन स्थापित हो जाने के उपरान्त भी यथेष्ट दिनों तक चलती रही।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. दास प्रथा (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 17 फ़रवरी, 2013।
  2. 2.0 2.1 2.2 दास प्रथा- दुनिया की हाट में बिकते इंसान (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 16 फ़रवरी, 2013।
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