दाग़ देहलवी  

दाग़ देहलवी
दाग़ देहलवी
पूरा नाम नवाब मिर्ज़ा ख़ाँ
जन्म 25 मई, 1831
जन्म भूमि दिल्ली
मृत्यु 1905
मृत्यु स्थान हैदराबाद
अभिभावक शम्सुद्दीन ख़ाँ, वजीर बेगम
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र उर्दू शायरी
मुख्य रचनाएँ 'गुलजारे दाग़', 'महताबे दाग़', 'आफ़ताबे दाग़', 'यादगारे दाग़', 'यादगारे दाग़- भाग-2', जिनमें 1038 से ज़्यादा गज़लें, अनेकों मुक्तक, रुबाईयाँ, सलाम मर्सिये आदि शामिल थे।
भाषा उर्दू
प्रसिद्धि शायर
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी दाग़ देहलवी की ग़ज़ल के नये रूप ने भाषा को वह मंझाव और पारदर्शिता दी, जिसमे बारीक़ से बारीक़ ख्याल के इज़हार की नयी सम्भावनाएँ थीं। ग़ालिब भी दाग़ के इस अंदाज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची
दाग़ देहलवी की रचनाएँ

दाग़ देहलवी (वास्तविक नाम:नवाब मिर्ज़ा ख़ाँ, अंग्रेज़ी: Daagh Dehlvi, जन्म- 25 मई, 1831, दिल्ली; मृत्यु- 1905, हैदराबाद) को उर्दू जगत् में एक शायर के रूप में बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त है। उनके जीवन का अधिकांश समय दिल्ली में व्यतीत हुआ था, यही कारण है कि उनकी शायरियों में दिल्ली की तहज़ीब नज़र आती है। दाग़ देहलवी की शायरी इश्क़ और मोहब्बत की सच्ची तस्वीर पेश करती है।

पारिवारिक परिचय

मुग़ल बादशाह शाहआलम, जो कि अन्धा हो चुका था, उसके आखिरी ज़माने में पठानों का एक ख़ानदान समरकंद से अपनी रोजी-रोटी की तलाश में भारत आया था। यह ख़ानदान कुछ महीने तक ज़मीन-आसमान की खोज में इधर-उधर भटकता रहा और फिर दिल्ली के एक मोहल्ले बल्लीमारान में बस गया। इस ख़ानदान की दूसरी पीढ़ी के एक नौजवान अहमद बख़्श ख़ाँ ने अलवर के राजा बख़्तावर सिंह के उस फौजी दस्ते की सरदारी का फ़र्ज़ निभाया, जो राजा की और से भरतपुर के राजा के ख़िलाफ़ अंग्रेज़ों की मदद के लिए भेजा गया था। लड़ाई के मैदान में अहमद बख़्श ख़ाँ ने अपनी जान को दाँव पर लगाकर एक अंग्रेज़ की जान बचाई थी। उसकी इस वफ़ादारी के लिए लॉर्ड लेक उसे फ़िरोजपुर और झरका की जागीरें इनाम में दे देता है।[1]

पिता की फाँसी

अहमद बख़्श ख़ाँ का बड़ा लड़का शम्सुद्दीन ख़ाँ, जो उसकी अलवर की मेवातन बीवी से उत्पन्न हुआ था, उसने जागीर में नाइंसाफ़ी के लिए अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। वह ब्रिटिश रेजिडेंट के क़त्ल की भी साजिश रचने लगा। लेकिन उसकी इस साजिश का पता अंग्रेज़ सरकार को लग गया और उसे 1835 ई. में फाँसी दे दी गई। दाग़ देहलवी इसी शम्सुद्दीन ख़ाँ की पहली और अंतिम संतान थे, जो बाद में उर्दू ग़ज़ल के इतिहास में नवाब मिर्ज़ा ख़ाँ दाग़ देहलवी के नाम से प्रसिद्ध हुए। अपने पिता की फाँसी के समय दाग़ देहलवी मात्र चार साल और चार महीने के थे। अंग्रेज़ों के भय से दाग़ देहलवी की माँ वजीर बेगम कई वर्षों तक छिप कर रहीं और इस दौरान दाग़ देहलवी अपनी मौसी के जहाँ रहे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 1.4 1.5 1.6 परिचय- दाग़ देहलवी (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 12 मार्च, 2013।
  2. उचित
  3. ग़ज़लों की किताब
  4. खंडकाव्य
  5. पूँजी
  6. किसी स्त्री से प्रेम करने वाले दो पुरुष
  7. सन्देश
  8. धृष्टता, दु:साहस, बेबाकी, बदतमीज़ी
  9. निधि, कोष, भंडार
  10. सजावट, रौनक, शोभा
  11. शीघ्र, त्वरित, फ़ौरन
  12. पद्यात्मक रचना, नज़्म की एक क़िस्म, जिसमें किसी महान् व्यक्ति की प्रशंसा की जाती है।
  13. साज़ बजाने वाला, वादक, तंत्री
  14. पाणिग्रहण, विवाह, ब्याह
  15. बालों को रंगने का मसाला
  16. सन्देह
  17. जाति
  18. नौकरानी, दासी
  19. अपूर्ण, अधूरा

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