तंजौर कला  

तंजौर चित्रकला

तंजौर कला लोक कला और कहानी-किस्से सुनाने की विस्मृत कला से जुड़ी है। तंजौर की प्रसिद्ध चित्रकारी पारंपरिक कला का ही रूप है। इस कला ने भारत को विश्व मंच पर प्रसिद्धि दिलाने में महती भूमिका निभाई है। धार्मिकता से ओतप्रोत और पौराणिक वृत्तांत ही इसके मुख्य विषय रहे हैं। कला और शिल्प दोनों का ही एक अच्छा मिश्रित रूप तंजौर की चित्रकारी में भी दिखाई देता है। चित्रकारी में हिन्दू देवी-देवताओं को ही मुख्य विषय बनाया गया है। तस्वीरें एक विलक्षण रूप में संजीव प्रतीत होती हैं।

चित्रकारी

एक राजसी विरासत वाले धार्मिक चित्र 'तंजावर चित्रकारी', जिसे अब 'तंजौर चित्रकारी' के नाम से जाना जाता है, की सर्वोत्तम परिभाषा हैं। तंजौर कि चित्रकारी महान् पारंपरिक कला रूपों में से है, जिसने भारत को विश्वप्रसिद्ध बनाया है। इनका विषय मूलत: पौराणिक है। ये धार्मिक चित्र दर्शाते हैं कि आध्यात्मिकता रचनात्मक कार्य का सार है। कला के कुछ रूप ही तंजौर की चित्रकारी की सुंदरता और भव्यता से मेल खाते हैं। चेन्नई से 300 कि.मी. दूर तंजावुर में शुरू हुई यह कला चोल साम्राज्य के राज्य काल में सांस्कृतिक विकास की ऊँचाई पर पहुँची। इसके बाद आने वाले शासकों के संरक्षण में यह कला आगे और समृद्ध हुई। शुरू में ये भव्य चित्र राज भवनों की शोभा बढ़ाते थे, लेकिन बाद में ये घर-घर में सजने लगे।

भारत के हर प्रदेश में चित्रों का प्रयोग किसी बात की अभिव्यक्ति दृश्य चित्रण के माध्यम से करने के लिए किया जाता है, जो कथन का ही एक प्रतिपक्षी रूप है। राजस्थान, गुजरात और बंगाल के ये कला रूप स्थान विशेष के वीरों और देवताओं की पौराणिक कथाएँ सुनाते हैं और हमारे प्राचीन वैभव और भव्य सांस्कृतिक विरासत का बहुमूर्तिदर्शी चित्रण प्रस्तुत करते हैं। हर कृति अपने आप में एक पूर्ण वृत्तांत है, जो प्राचीन काल की एक झांकी प्रस्तुत करती है, जिसे कलाकारों की प्रवीणता और निष्ठा ने जीवित रखा है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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