तंजावुर  

तंजावुर अथवा 'तंजौर' तंजावुर ज़िले का प्रशासिक मुख्यालय है, जो तमिलनाडु राज्य, दक्षिण-पूर्वी भारत में कावेरी के डेल्टा में स्थित है। नौवीं से ग्याहरवीं शताब्दी तक चोलों की आरंभिक राजधानी तंजौर, विजयनगर, मराठा तथा ब्रिटिश काल के दौरान भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण रहा। अब यह एक पर्यटक स्थल है और इसके आकर्षणों में बृहदीश्वर चोल मंदिर, विजयनगर क़िला और मराठा राजकुमार सरफ़ोजी का महल शामिल है। कपास मिल, पारंपरिक हथकरघा और वीणा निर्माण यहां की प्रमुख औद्योगिक गतिविधियां हैं। तमिलनाडु के पूर्वी मध्यकाल में तंजौर या तंजावुर नगरी चोल साम्राज्य की राजधानी के रूप में काफ़ी विख्यात थी। तंजौर को 'मन्दिरों की नगरी' कहना उपयुक्त होगा, क्योंकि यहाँ पर 75 छोटे-बड़े मन्दिर हैं।

स्थिति तथा इतिहास

वर्तमान में यह नगर चैन्नई से लगभग 218 मील दक्षिण-पश्चिम में कावेरी नदी के तट पर स्थित है। चोल वंश ने 400 वर्ष से भी अधिक समय तक तमिलनाडु पर राज किया। इस दौरान तंजावुर ने बहुत उन्नति की। इसके बाद नायक और मराठों ने यहाँ शासन किया। वे कला और संस्कृति के प्रशंसक थे। कला के प्रति उनका लगाव को उनके द्वारा बनवाई गई उत्‍कृष्‍ट इमारतों से साफ़ झलकता है।

मन्दिर

तंजौर चोल शासक राजराज (985-1014 ई.) द्वारा निर्मित भव्य वृहदेश्वर मन्दिर के लिए प्रसिद्ध है। इसका शिखर 190 फुट ऊँचा है। शिखर पर पहुँचने के लिए 14 मंज़िले हैं। यह मन्दिर भारतीय स्थापत्य का अदभुत नमूना है। यह चारों ओर से लम्बी परिखा से परिवेष्ठित है। इसमें एक विशाल शिवलिंग है। पत्थर का बनाया गया एक विशाल नंदी मन्दिर के सामने प्रतिष्ठित है। मन्दिर में विशाल तोरण एवं मण्डप हैं। यह वृहद् भवन आधार से चोटी तक नक़्क़ाशी और अलंकृत ढाँचों से सुसज्जित हैं। यह मन्दिर अन्य सहायक मन्दिरों के साथ एक प्रांगण के केन्द्र में स्थित है, किंतु सम्पूर्ण क्षेत्र उच्च शिखर द्वारा प्रभावित है। इसे राजराजेश्वर मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है।

चोल शासक

चोल शासकों के हाथों से कालांतर में तंजौर होयसल एवं पांड्य राज्यों के शासनाधीन हो गया। अलाउद्दीन ख़िलजी के नायक मलिक काफ़ूर ने इस पर आक्रमण कर लूटा। तदनंतर तंजौर विजय नगर साम्राज्य का अंग बन गया। 16वीं शताब्दी में यहाँ नायक वंश ने अपना राज्य स्थापित कर लिया। फिर 1674ई. में मराठों ने इस पर अधिकार कर लिया। यहाँ से विभिन्न शासकों के अभिलेख, मुद्राएँ आदि प्राप्त हुई हैं। होयसल नरेश सोमेश्वर एवं रामनाथ के अभिलेख तंजौर से प्राप्त हुए हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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