जैमिनीय श्रौतसूत्र  

सामवेद की जैमिनीय शाखा अत्यन्त समृद्ध है। इसके गान ग्रन्थ, ब्राह्मण, श्रौतसूत्र परिशेष एवं गृह्यसूत्र आदि सभी ग्रन्थ उपलब्ध हैं। जैमिनीय श्रौतसूत्र तीन खण्डों में विभक्त है– सूत्र कल्प तथा पर्यध्याय जो पुन: 18 अध्यायों में विभाजित हैं। सूत्रखण्ड अत्यन्त लघु है, जिसमें लम्बे–लम्बे वाक्यों से युक्त 26 कण्डिकाओं में ज्योतिष्टोम, अग्न्याधान तथा अग्निचयन से सम्बद्ध सामों का विवरण प्रदत्त है।

सोमयाग

कल्पखण्ड कौथुमीयय मशककल्प के समानान्तर प्रणीत प्रतीत होता है। इसमें अनेक उपख्ण्ड हैं। स्तोत्रकल्प में विभिन्न स्तोत्रों के लिए स्तोत्रों का विवरण है। समस्त सोमयागों के याग–दिवसों और यज्ञानुष्ठान के क्रम का वर्णन भी है। प्रकृतिकल्प (अथवा प्राकृत) में एकाहों, अहीनों तथा सत्रयागों की प्रकृतियों (क्रमश: ज्योतिष्टोम, द्वादशाह तथा गवामयन) में प्रयोज्य सामों का विवरण है। संज्ञाकल्प में परिभाषिक शब्दों की व्याख्या की गई है। 'विकृतिकल्प' में एकाहों, अहीनों और सोमयागों की विकृतियों का सामगान की दृष्टि से निरूपण है।

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