जलप्रपात  

जलप्रपात शब्द से साधारणत: पानी के संकलित रूप से गिरने का बोध होता है। प्राचीन समय से ही प्रपातों से अनेक लाभ उठाए जा रहे हैं। सर्वप्रथम प्रपातों द्वारा पनचक्की चलाने का प्रचलन हुआ। पर्वतीय प्रदेशों में पनचक्कियाँ विशेषकर जलप्रपातों द्वारा ही चलती हैं और लोग पनचक्कियों द्वारा ही पिसाई कराते हैं। जब नहरों का निर्माण हुआ तब जलप्रपातों पर पहले पनचक्कियाँ ही स्थापित की गईं, जिससे सिंचाई के अतिरिक्त आटा पीसे जाने की सुविधा हो सके। फिर जब पनबिजली का विकास हुआ तब जलप्रपातों पर पनबिजली बनाने के लिये बड़े बड़े यंत्र लगाए जाने लगे।[1]

जलप्रपातों की उत्पत्ति

जलप्रपातों की उत्पत्ति दो प्रकार से होती है-

  1. प्राकृतिक जलप्रपात
  2. कृत्रिम जलप्रपात

प्राकृतिक जलप्रपात

प्राकृतिक जलप्रपात बहुधा पर्वतीय क्षेत्रों में होते हैं, जहाँ भूतल का उतार चढ़ाव अधिक होता है। वर्षा ऋतु में तो छोटे बड़े जल-प्रपात प्राय: सभी पहाड़ी क्षेत्रों में देखने को मिलते हैं, कुछ क्षेत्रों में, भू-स्तर तुलनात्मक तौर पर कठोर और नरम होने के कारण, बहते पानी से कटाव द्वारा भूतल में एक ही स्थल पर गिराव पैदा हो जाता है और कहीं-कहीं सामान्य समतल क्षेत्रों में भी जलप्रपात प्राकृतिक रूप से बन जाते हैं। पृथ्वी के गुरुत्व द्वारा प्रेरित होकर पानी का वेग जैसे-जैसे बढ़ता है, वैसे ही उसके भू-स्तर के कटाव की क्षमता बढ़ती जाती है और प्रपात बड़ा होता जाता है। यह क्रिया तब तक जारी रहती है जब तक कि कुछ प्राकृतिक संतुलन न हो जाए, और प्रपात के विस्तार में स्थिरता नहीं आ जाती है।[1]

कृत्रिम जलप्रपात

कृत्रिम प्रपात बहुधा नहरों पर बनाए जाते हैं। जहाँ नहरें यातायात के लिए बनी होती हैं, वहाँ पानी के वेग को कम करने के लिये प्रपात बनाए जाते हैं और नावों का आवागमन लॉकों[2] द्वारा हुआ करता है। कभी-कभी नदियों में भी ऐसे लॉक बनाए जाते हैं। भू-सिंचाई के लिए बनाई गई नहरों में भी जलप्रपात इसीलिए बनाए जाते हैं कि पानी का वेग कम किया जा सके। ऐसे बहुत से प्रपात उत्तर प्रदेश की गंगा तथा शारदा नहरों पर बनाए गए हैं। अन्य प्रदेशों की नहरों पर भी जलप्रपात बनाए जाते हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 जलप्रपात (हिन्दी) भरतखोज। अभिगमन तिथि: 30 जुलाई, 2015।
  2. locks

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