जय गुरुदेव  

जय गुरुदेव
जय गुरुदेव
पूरा नाम बाबा जय गुरुदेव
अन्य नाम तुलसीदास[1]
जन्म ज्ञात नहीं
जन्म भूमि गांव खितौरा, इटावा जिले, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 18 मई, 2012
मृत्यु स्थान मथुरा
गुरु संत घूरेलाल जी शर्मा
भाषा हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी
नागरिकता भारतीय
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बाबा जय गुरुदेव (अंग्रेज़ी: Jai Gurudev, जन्म- ज्ञात नहीं; मृत्यु- 18 मई, 2012, मथुरा, उत्तर प्रदेश) एक प्रसिद्ध धार्मिक गुरु थे। जय गुरुदेव के भक्तों की संख्या देश-विदेश में 20 करोड़ से ज्यादा है और जो उनके एक इशारे पर दौड़े चले आते थे। गुरु के महत्व को सर्वोपरि रखने वाले बाबा जय गुरुदेव भी इसी नाम से प्रसिद्ध हो गए। अपने प्रत्येक कार्य में अपने गुरु देव का स्मरण कर जय गुरु देव का उद्घोष करते थे। वह बाबा जयगुरुदेव के नाम से ही जाने जाने लगे। आम आदमी भी उनको इसी संबोधन से दशकों तक जानता आया और उनके प्रचार का ख़ास माध्यम दीवारों पर लिखा उनका नारा होता था ‘जयगुरु देव, सतयुग आएगा’। बाबा जय गुरुदेव गुरु के सान्निध्य को जीवन भर रेखांकित करते रहे। उनका कहना था, हर मर्ज की दवा है। हर समस्या का हल है। बस गुरु की शरण में चले आओ। मैं तो यह जानता हूं कि आप मजबूर होकर आओगे और मैं तब भी आपकी मदद के लिए तैयार रहूंगा। बाबा की सोच व विचार गांव और ग़रीब दोनों से जुड़े थे। बाबा कहते थे- शरीर तो किराए की कोठरी है, इसके लिए 23 घंटे दो लेकिन इस मंदिर में बसने वाले देव यानी आत्मा के लिए कम से कम एक घंटा ज़रूर निकालो। इससे ईश्वर प्राप्ति सहज हो जाएगी।

जीवन परिचय

बाबा जय गुरुदेव का बचपन का नाम तुलसीदास था। बाबा की जन्म तिथि की कोई पक्की जानकारी नहीं है लेकिन बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश में इटावा जिले के भरथना स्थित गांव खितौरा नील कोठी प्रांगण में हुआ था। जय गुरुदेव नामयोग साधना मंदिर के प्रकाशन में इस साल उनकी उम्र 116 साल बताई गई। वह हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी में पारंगत थे।

उन्होंने कोलकाता में 5 फरवरी 1973 को सत्संग सुनने आए अनुयायियों के सामने कहा था कि सबसे पहले मैं अपना परिचय दे दूँ - मैं इस किराये के मकान में पांच तत्व से बना साढ़े तीन हाथ का आदमी हूं। इसके बाद उन्होंने कहा था - मैं सनातन धर्मी हूं, कट्टर हिंदू हूं, न बीड़ी पीता हूं न गांजा, भांग, शराब और न ताड़ी। आप सबका सेवादार हूं। मेरा उद्देश्य है सारे देश में घूम-घूम कर जय गुरुदेव नाम का प्रचार करना। मैं कोई फ़कीर और महात्मा नहीं हूं। मैं न तो कोई औलिया हूं न कोई पैगंबर और न अवतारी।

गुरुदेव के गुरु

बाबा जयगुरुदेव जब सात साल के थे तब उनके मां-बाप का निधन हो गया था। उसके बाद वह सत्य की खोज में निकल पड़े। और इसके बाद से ही उन्होंने मंदिर-मस्जिद और चर्च का भ्रमण करना शुरू कर दिया था। यहां वे धार्मिक गुरुओं की तलाश करते थे। कुछ समय बाद घूमते-घूमते अलीगढ़ के चिरौली गांव (इगलास तहसील) पहुंचे। वहां उनकी मुलाकात संत घूरेलाल जी शर्मा (दादा गुरु) से हुई और उन्होंने जीवन भर के लिए उन्हें अपना गुरु मान लिया। उन्हीं के पास बाबा वर्षो झोपड़ी में रहे। उनके सान्निध्य में एक-एक दिन में 18-18 घंटे तक साधना करते थे। दिसंबर 1950 में उनके गुरु घूरे लाल जी का निधन हो गया। संत घूरेलालजी के दो‍ शिष्य थे। एक चंद्रमादास और दूसरे तुलसीदास (जय बाबा गुरुदेव)। कालांतर में चंद्रमादास भी नहीं रहे। गांव चिरौली में गुरु के आश्रम को राधास्वामी सत्संग भवन के नाम से जाना जाता है। वहां घूरेलाल महाराज के सत्संग भवन के साथ चंद्रमादास का समाधि स्थल भी है।

प्रवचन की शुरुआत

बाबा जय गुरुदेव आजादी से पहले वे अलीगढ़ में अपने गुरु घूरेलाल शर्मा से दीक्षा लेने के बाद वे पहली बार 10 जुलाई 1952 को वाराणसी में प्रवचन देने के लिए समाज के सामने उपस्थित हुए। इसके बाद क़रीब आधे दशक पूरे देश में तुलसीदास महाराज या फिर जय गुरुदेव की धूम रही। 29 जून 1975 के आपातकाल के दौरान वे जेल गए, आगरा सेंट्रल, बरेली सेंटल जेल, बेंगलूर की जेल के बाद उन्हें नई दिल्ली के तिहाड़ जेल ले जाया गया। वहां से वह 23 मार्च 1977 को रिहा हुए। जय गुरुदेव के अनुयायी इस दिवस को मुक्ति दिवस के रूप में मनाते हैं। जेल से छूटने के बाद गुरुदेव जब मथुरा आश्रम आये तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उनके आश्रम में पहुंचकर आपातकाल के लिये माफी मांगी। अपनी आध्यात्मिक यात्रा के दौरान उन्होंने राजनीति की असफल यात्रा भी की। वर्ष 1980 और 90 के दशक के दौरान उन्होंने दूरदर्शी पार्टी बनाई लेकिन वे बहुत सफल नहीं हुए। उन्‍होंने संसद का चुनाव लड़ा, लेकिन जीत हासिल नहीं हुई।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. बचपन में बाबा जयगुरुदेव का नाम तुलसीदास था।
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