छप्पर  

फूस से निर्मित छप्पर

छप्पर (अंग्रेज़ी:Thatching) प्राचीन समय से ही भारत की संस्कृति का अमिट हिस्सा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में यह आज भी देखे जा सकते हैं। छप्पर कच्चे मकानों, झोपड़ियों आदि की उस छाजन को कहते हैं, जो बाँसों, लकड़ियों तथा फूस की बनी होती है। किसी प्रकार का आवरण जो रक्षा के लिए ऊपर लगाया जाय, उसे भी छप्पर कहा जाता हैं, जैसे- नाव पर का छप्पर। इसे संस्कृत में छत्त्वर, प्राकृत में छप्पर, बांग्ला में छापर, उड़िया में छपर, गुजराती में छाप्रो, नेपाली में छाप्रो, और मराठी में छप्पर के नाम से जाना जाता है।

घास-फूस आदि का प्रयोग

भारत के ग्रामीण अंचलों के घर प्रायः कच्चे होते हैं। इन घरों की रचना में उनकी वैज्ञानिक सोच परिलक्षित होती है। यहाँ निर्मित अधिकांश घरों में घास-फूस आदि के छप्पर बनाये जाते हैं। भारत के मालवा में घरों के छप्पर मुख्य रूप से 'कवेलू' एवं 'ओरा'[1] से बनाये जाते हैं। ये छप्पर ढालू बनाये जाते हैं, परंतु इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वर्षा का पानी घर में न जाने पाये। कमरे की हवा को ठंडा रखने के लिए आवश्यकतानुसार दुहरे कवेलू का छप्पर बनाया जाता है। घरों में प्रकाश मिलता रहे, उसके लिए रोशनदान एवं खिड़कियाँ रखी जाती हैं। यह छप्पर वैज्ञानिक दृष्टि से वायु-शुद्धता की आवश्यकता एवं महत्व को प्रकट करते हैं।

वायु की शुद्धता

यह सर्वविदित है कि गाँवों में भोजन प्रायः चूल्हे पर बनाया जाता है। इसमें ईंधन के रूप में लकड़ी-कंडे आदि का उपयोग किया जाता है। लकड़ी या कंडे के जलने से धुँआ निकलता है तथा यह धुँआ ऊपर उठने का प्रयास करता है। यदि धुँए को निकलने का मार्ग नहीं मिलेगा तो यह घर में एकत्रित हो जायेगा, अर्थात् लकड़ी या कंडे के जलने से कार्बन एवं हवा की ऑक्सीजन का संयोग होता है तथा उससे कार्बन डाइ-ऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड उत्पन्न होती हैं। कार्बन मोनोऑक्साड वायु विषैली होती है, जो स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद है। इसलिये गाँवों में वायु की शुद्धता की दृष्टि से घरों के छप्पर घास-फूस आदि से अधिक बनाये जाते हैं। इससे छप्पर से धुँआ आसानी से निकल जाता है तथा वायु शुद्ध बनी रहती है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. खजूर के तने व पीली मिट्टी

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