घृत सागर  

'एते द्वीपा: समुद्रैस्तु सप्त सप्तभिरावृता:, लवणेक्षु सुरासर्पि दधि जलै: समम्'।[2]



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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. विष्णु पुराण 2,2,6
  2. विष्णु पुराण 2,2,6

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