गोपीनाथ बोरदोलोई  

विश्वविद्यालयों की स्थापना

1929 ई. में सरकारी विद्यालयों में राजनीतिक गतिविधियों पर रोक के संबंध में सरकार का आदेश निकला, तो गोपीनाथ बोरदोलोई ने ऐसे विद्यालयों के बहिष्कार का आंदोलन चलाया। परंतु वे शिक्षा के महत्त्व को समझते थे। उनके प्रयत्न से गौहाटी में 'कामरूप अकादमी' और 'बरुआ कॉलेज' की स्थापना हुई। आगे चलकर जब उन्होंने प्रशासन का दायित्व संभाला तो 'गौहाटी विश्वविद्यालय', 'असम मेडिकल कॉलेज' तथा अनेक तकनीकी संस्थाओं की स्थापना में सक्रिय सहयोग दिया।

जेल यात्रा

1938 ई. में असम में जो पहला लोकप्रिय मंत्रिमंडल बना, उसके मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई ही थे। इस बीच उन्होंने असम में अफ़ीम पर प्रतिबंध लगाने का ऐतिहासिक काम किया। विश्वयुद्ध आरंभ होने पर उन्होंने भी इस्तीफ़ा दे दिया और जेल की सज़ा भोगी। युद्ध की समाप्ति के बाद वे दुबारा असम के मुख्यमंत्री बने। स्वतंत्रता के बाद का यह समय नवनिर्माण का काल था।

असम निर्माता

भारत को स्वतन्त्रता देने से पूर्व जिस समय भारत के विभाजन की बात चल रही थी, उस समय असम में गोपीनाथ बोरदोलोई के हाथ में सत्ता थी। ब्रिटिश सरकार की योजना से ऐसा प्रतीत होता था कि असम प्रदेश को कुछ भागों में बाँट कर पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश) में सम्मिलित कर दिया जाएगा। गोपीनाथ और उनके साथी यदि समय रहते सजग न होते तो असम आज बंगलादेश को हिस्सा होता। 'भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम' से सम्बन्धित व्यक्ति जानते है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश सरकार ने भारत की इच्छा के विपरीत उसे युद्ध का भागीदार बना दिया था। उस समय गांधीजी ने जब असहयोग को नारा दिया तो गोपीनाथ बोरदोलोई के मन्त्रिमण्डल ने त्याग पत्र दे दिया था। विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 1946 में असम में कांग्रेस की भारी बहुमत से जीत हुई और गोपीनाथ बोरदोलोई मुख्यमंत्री बने। यहाँ एक विशेष बात उल्लेखनीय है कि उस समय अनेक प्रदेशों के मुख्यमन्त्रियों को प्रधानमन्त्री कहा जाता था। इसी कारण ब्रिटिश सरकार के जितने प्रतिनिधि मण्डल आए, वे सब अलग-अलग प्रदेशों के प्रधानमन्त्रियों से बात करते थे। प्रारम्भ में इस बातचीत में गोपीनाथ बोरदोलोई को इसलिए नहीं बुलाया गया, क्योंकि ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि उनके भारत समर्थक विचारों से भली प्रकार परिचित थे। ब्रिटिश सरकार की एक बड़ी चाल यह थी कि भारत के विभिन्न भागों को अलग-अलग बाँटने के लिए उन्होंने 'ग्रुपिंग सिस्टम' योजना बनाई। उन्होंने यह योजना कांग्रेस के प्रतिनिधियों के सामने रखी।

उन्हीं दिनों 6 जुलाई और 7 जुलाई को मुम्बई में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। कांग्रेस ने योजना पर विचार किया और दुःख की बात यह है कि कांग्रेसी नेता ब्रिटिश सरकार की चाल को समझ नहीं पाए और उन्होंने योजना के लिए स्वीकृति दे दी। गोपीनाथ बोरदोलोई इस योजना के सर्वथा विरुद्ध थे। उनका कहना था कि असम के सम्बन्ध में जो भी निर्णय किया जाएगा अथवा उसका जो भी संविधान बनाया जाएगा, उसका पूरा अधिकार केवल असम की विधानसभा और जनता को होगा। वे अपने इस निर्णय पर डटे रहे। उनकी इसी दूरदर्शिता के कारण असम इस षड़यंत्र का शिकार होने से बच सका। गोपीनाथ बोरदोलोई ने अपने देश के प्रति सच्ची निष्ठा के कारण भारतीय स्तर के नेताओं में इतना महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था कि वे इनकी बात मानने को तैयार हुए। इस प्रकार असम भारत का अभिन्न अंग बना रहा। यही कारण है कि भारत और असम के लोग उनके इस महत्त्वपूर्ण कार्य को समझ सके। असम के लोग आज बड़े प्यार से गोपीनाथ बोरदोलोई को शेर-ए-असम के नाम से पुकारते हैं।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 असम के महान् सपूत- गोपीनाथ बोरदोलाई (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 23 जुलाई, 2013।

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