गर्जिया देवी मन्दिर  

गर्जिया देवी मन्दिर
'गर्जिया देवी मन्दिर', उत्तराखण्ड
विवरण 'गर्जिया देवी मन्दिर' उत्तराखण्ड के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। माँ गिरिजा देवी के नाम पर ही इस मन्दिर को 'गर्जिया देवी मन्दिर' कहा जाता है।
राज्य उत्तराखण्ड
स्थिति रामनगर, उत्तराखण्ड से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर।
धार्मिक मान्यता भक्तों की मनोकामना पूर्ण होने पर वे मन्दिर में घण्टी या छत्र आदि चढ़ाते हैं।
विशेष नवरात्र तथा गंगा स्नान पर हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु यहाँ आते हैं। अनुमान है कि वर्ष भर में पांच लाख से भी ज़्यादा श्रद्धालु यहाँ आते हैं।
अन्य जानकारी मन्दिर में पहुँचने से पहले श्रद्धालु कोसी नदी में स्नान करते हैं। नदी से मन्दिर तक जाने के लिये 90 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। दर्शन के बाद श्रद्धालु भैरों मन्दिर, शिव मन्दिर के दर्शन करते हैं तथा खिचड़ी चढाते हैं।

गर्जिया देवी मन्दिर या 'गिरिजा देवी मन्दिर' उत्तराखण्ड के सुंदरखाल गाँव में स्थित है, जो माता पार्वती के प्रमुख मंदिरों में से एक है। यह मंदिर श्रद्धा एवं विश्वास का अद्भुत उदाहरण है। उत्तराखण्ड का यह प्रसिद्ध मंदिर रामनगर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर छोटी पहाड़ी के ऊपर बना हुआ है, जहाँ का खूबसूरत वातावरण शांति एवं रमणीयता का एहसास दिलाता है। देवी के प्रसिद्ध मन्दिरों में गिरिजा देवी (गर्जिया देवी) का स्थान अद्वितीय है। गिरिराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ही इन्हें इस नाम से पुकारा जाता है। मान्यता है कि जिन मन्दिरों में देवी वैष्णवी के रूप में स्थित होती हैं, उनकी पूजा पुष्प प्रसाद से की जाती है और जहाँ शिव शक्ति के रूप में होती हैं, वहाँ बलिदान का प्रावधान है।

इतिहास

पुरातत्ववेत्ताओं का कथन है कि कूर्मांचल की सबसे प्राचीन बस्ती ढिकुली के पास थी, जहाँ पर वर्तमान रामनगर बसा हुआ है। कोसी नदी के किनारे बसी इसी नगरी का नाम तब 'वैराट पत्तन' या 'वैराट नगर' था। कत्यूरी राजाओं के आने के पूर्व यहाँ पहले कुरु राजवंश के राजा राज्य करते थे, जो प्राचीन इन्द्रप्रस्थ (आधुनिक दिल्ली) के साम्राज्य की छत्रछाया में रहते थे। ढिकुली, गर्जिया क्षेत्र का लगभग 3000 वर्षों का अपना इतिहास रहा है। प्रख्यात कत्यूरी राजवंश, चन्द्र राजवंश, गोरखा वंश और अंग्रेज़ शासकों ने यहाँ की पवित्र भूमि का सुख भोगा है। गर्जिया नामक शक्ति स्थल सन 1940 से पहले उपेक्षित अवस्था में था, किन्तु 1940 से पहले की भी अनेक दन्तश्रुतियाँ इस स्थान का इतिहास बताती हैं। वर्ष 1940 से पूर्व इस मन्दिर की स्थिति आज जैसी नहीं थी, कालान्तर में इस देवी को उपटा देवी (उपरद्यौं) के नाम से जाना जाता था। तत्कालीन जनमानस की धारणा थी कि वर्तमान गर्जिया मंदिर जिस टीले में स्थित है, वह कोसी नदी की बाढ़ में कहीं ऊपरी क्षेत्र से बहकर आ रहा था। मंदिर को टीले के साथ बहते हुये आता देखकर भैरव देव द्वारा उसे रोकने के प्रयास से कहा गया- "थि रौ, बैणा थि रौ" अर्थात् 'ठहरो, बहन ठहरो', यहाँ पर मेरे साथ निवास करो। तभी से गर्जिया में देवी उपटा में निवास कर रही हैं।[1]

धार्मिक मान्यता

मान्यता है कि वर्ष 1940 से पूर्व यह क्षेत्र भयंकर जंगलों से भरा पड़ा था। सर्वप्रथम जंगल विभाग के तत्कालीन कर्मचारियों तथा स्थानीय छुट-पुट निवासियों द्वारा टीले पर मूर्तियों को देखा गया और उन्हें माता जगजननी की इस स्थान पर उपस्थिति का एहसास हुआ। एकान्त सुनसान जंगली क्षेत्र, टीले के नीचे बहती कोसी नदी की प्रबल धारा, घास-फूस की सहायता से ऊपर टीले तक चढ़ना, जंगली जानवरों की भयंकर गर्जना के बावजूद भी भक्तजन इस स्थान पर माँ के दर्शनों के लिये आने लगे। जंगल के तत्कालीन बड़े अधिकारी भी यहाँ पर आये थे। कहा जाता है कि टीले के पास माँ दुर्गा का वाहन शेर भयंकर गर्जना किया करता था। कई बार शेर को इस टीले की परिक्रमा करते हुये भी लोगों द्वारा देखा गया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 गर्जिया देवी मन्दिर, रामनगर, उत्तराखण्ड (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 10 अक्टूबर, 2013।
  2. गर्जिया देवी मन्दिर-धार्मिक पर्यटन का केन्द्र (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 10 अक्टूबर, 2013।

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