कोहिनूर हीरा  

कोहिनूर हीरा

कोहिनूर हीरा (अंग्रेज़ी:Koh-i-noor Diamond) दुनिया के सभी हीरों का राजा है, जिसे गोलकुंडा (भारत) की एक खान से निकाला गया था। कोहिनूर को फ़ारसी में "कूह-ए-नूर" कहा जाता है, जिसका अर्थ है- "कुदरत की विशाल आभा या रोशनी का पर्वत"। यह हीरा 105 कैरेट (लगभग 21.600 ग्राम) का है। यह अभी तक विश्व का सबसे बड़ा ज्ञात ऐतिहासिक हीरा रह चुका है। कई मुग़ल बादशाहों और फ़ारसी शासकों से होता हुआ, यह हीरा अनतत: ब्रिटिश शासन के अधिकार में चला गया और अब उनके ख़ज़ाने में शामिल है। भारत में अंग्रेज़ शासन के दौरान इसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री बेंजामिन डिजराएली ने महारानी विक्टोरिया को तब भेंट किया, जब सन 1877 में उन्हें भारत की भी सम्राज्ञी घोषित किया गया था।

इतिहास

कोहिनूर का उद्गम व आरम्भिक इतिहास स्पष्ट नहीं है। इसकी कहानी भी परी कथाओं से कम रोमांचक नहीं है। इसके खनन से जुड़ी दक्षिण भारत में हीरों की कई कहानियाँ रहीं हैं, परंतु कौन-सी कोहिनूर से सम्बन्धित है, यह कहना कठिन है। 14वीं शताब्दी से पूर्व इस हीरे का इतिहास ठीक ज्ञात नहीं है।

बाबर का अधिकार

दिल्ली सल्तनत में ख़िलजी वंश का अंत 1320 में होने के बाद ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने गद्दी संभाली। उसने अपने पुत्र उलूग ख़ाँ को 1323 में काकतीय वंश के राजा प्रतापरुद्रदेव को युद्ध में हराने भेजा था। इस हमले को कड़ी टक्कर मिली, परन्तु उलूग ख़ाँ एक बड़ी सेना के साथ फिर युद्ध करने लौटा। इसके लिए अनपेक्षित राजा प्रतापरुद्रदेव वारंगल के युद्ध में हार गया। तब वारंगल की लूट-पाट, तोड़-फोड़ व हत्या-कांड महीनों चला। मुस्लिमों के हाथ सोना-चाँदी व हाथी-दांत की बड़ी मात्रा लगी, जो कि हाथियों, घोड़ों व ऊंटों पर लादकर दिल्ली ले जाई गई। कोहिनूर हीरा भी इस लूट का भाग था। यहीं से यह हीरा 'दिल्ली सल्तनत' के उत्तराधिकारियों के हाथों से मुग़ल सम्राट बाबर के हाथ 1526 में लगा।

बाबरनामा में उल्लेख

इस हीरे की प्रथम दृष्टया पक्की टिप्पणी यहीं सन 1526 से मिलती है। बाबर ने अपने संस्मरण में आगरा की विजय में एक बृहत्‌ उत्तम हीरा प्राप्त करने का उल्लेख किया है। संभवत: वह कोहिनूर ही था, क्योंकि उस हीरे का भार आठ मिस्कल (320 रत्ती) बताया गया है। तराशे जाने के पूर्व कोहिनूर का भार इतना ही था। बाबर ने अपने 'बाबरनामा' में लिखा है कि यह हीरा सन 1294 में मालवा के एक राजा का था।[1] बाबर ने इसका मूल्य यह आंका कि यह हीरा पूरे संसार का दो दिनों तक पेट भर सकता है। 'बाबरनामा' में दिया है कि किस प्रकार मालवा के राजा को जबर्दस्ती यह विरासत अलाउद्दीन ख़िलज़ी को देने पर मजबूर किया गया। उसके बाद यह 'दिल्ली सल्तनत' के उत्तराधिकारियों द्वारा आगे बढ़ाया गया, और अन्ततः 1526 में बाबर की जीत पर उसे प्राप्त हुआ। हालांकि 'बाबरनामा' 1526 से 1530 में लिखा गया था, परन्तु इसके स्रोत ज्ञात नहीं हैं। उसने इस हीरे को सर्वदा इसके वर्तमान नाम से नहीं पुकारा है। बल्कि एक विवाद के बाद यह निष्कर्ष निकला कि बाबर का हीरा ही बाद में कोहिनूर कहलाया। बाबर एवं हुमायूँ, दोनों ने ही अपनी आत्मकथाओं में बाबर के हीरे के उद्गम के बारे में लिखा है। यह हीरा पहले ग्वालियर के कछवाहा शासकों के पास था, जिनसे यह तोमर राजाओं के पास पहुँचा।

औरगज़ेब के पास

कोहिनूर हीरा

अंतिम तोमर शासक विक्रमादित्य को सिकन्दर लोदी ने हराया और अपने अधीन किया। उसने उसे अपने साथ दिल्ली में ही बंदी बना कर रखा। लोदी की मुग़लों से हार के बाद, मुज़लों ने उसकी संपत्ति लूटी, किन्तु हुमायूँ ने न केवल मध्यस्थता करके उसकी संपत्ति वापस दिलवा दी, बल्कि उसे छुड़वा कर मेवाड़, चित्तौड़ में पनाह लेने दी। हुमायूँ की इस भलाई के बदले विक्रमादित्य ने अपना एक बहुमूल्य हीरा, जो शायद कोहिनूर ही था, हुमायूँ को साभार दे दिया। परन्तु हुमायूँ का जीवन अति दुर्भाग्यपूर्ण रहा। वह शेरशाह सूरी से हार गया। सूरी भी एक तोप के गोले से जलकर मर गया। उसका पुत्र व उत्तराधिकारी जलाल ख़ान अपने साले द्वारा हत्या को प्राप्त हुआ। उस साले को भी उसके एक मंत्री ने तख्तापलट कर हटा दिया। वह मंत्री भी एक युद्ध को जीतते-जीतते आँख में चोट लग जाने के कारण हार गया और सल्तनत खो बैठा। हुमायूँ के पुत्र अकबर ने यह रत्न कभी अपने पास नहीं रखा, जो कि बाद में सीधे शाहजहाँ के ख़ज़ाने में ही पहुँचा। शाहजहाँ भी अपने बेटे औरंगज़ेब द्वारा तख्तापलट कर बंदी बनाया गया, जिसने अपने अन्य तीन भाइयों की हत्या भी की थी। निश्चित रूप से ज्ञात है कि कोहिनूर औरंगजेब के पास था और वह उसे बड़े यत्न से रखता था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सन्1306 में यह हीरा सबसे पहले मालवा के महाराजा रामदेव के पास देखा गया था।

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