कुरुक्षेत्र  

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कुरुक्षेत्र
कुरुक्षेत्र मानचित्र
विवरण माना जाता है कि कुरुक्षेत्र में महाभारत की लड़ाई हुई थी और भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश यहीं पर ज्योतीसर नामक स्थान पर दिया था।
राज्य हरियाणा
ज़िला कुरुक्षेत्र ज़िला
भौगोलिक निर्देशांक 29° 57′ 56.58″ उत्तर, 76° 50′ 13.22″ पूर्व
मार्ग स्थिति कुरुक्षेत्र अम्बाला से 25 मील पूर्व में है।
क्षेत्रफल 1,530 वर्ग किमी
भाषा हिंदी, हरियाणवी
Map-icon.gif गूगल मानचित्र
पिन कोड 136118
एस.टी.डी. कोड 911744
वाहन पंजीयन कोड HR 07
धार्मिक मान्यता कहा जाता है कि यहाँ स्थित विशाल तालाब का निर्माण महाकाव्य महाभारत में वर्णित कौरवों और पांडवों के पूर्वज राजा कुरु ने करवाया था। कुरुक्षेत्र नाम 'कुरु के क्षेत्र' का प्रतीक है।
अन्य जानकारी कुरुक्षेत्र का पौराणिक महत्त्व अधिक माना जाता है। इसका ऋग्वेद और यजुर्वेद में अनेक स्थानो पर वर्णन किया गया है।
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कुरुक्षेत्र (अंग्रेज़ी: Kurukshetra) हरियाणा राज्य का एक ऐतिहासिक नगर और ज़िला है। यह हरियाणा के उत्तर में स्थित है तथा अम्बाला, यमुना नगर, करनाल और कैथल से घिरा हुवा है। माना जाता है कि यहीं महाभारत की लड़ाई हुई थी और भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश यहीं पर ज्योतीसर नामक स्थान पर दिया था। यह ज़िला बासमती चावल के उत्पादन के लिए भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यहाँ स्थित विशाल तालाब का निर्माण महाकाव्य महाभारत में वर्णित कौरवों और पांडवों के पूर्वज राजा कुरु ने करवाया था। कुरुक्षेत्र नाम 'कुरु के क्षेत्र' का प्रतीक है। कुरुक्षेत्र का पौराणिक महत्त्व अधिक माना जाता है। इसका ऋग्वेद और यजुर्वेद में अनेक स्थानो पर वर्णन किया गया है। यहाँ की पौराणिक नदी सरस्वती का भी अत्यन्त महत्त्व है। इसके अतिरिक्त अनेक पुराणों, स्मृतियों और महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत में इसका विस्तृत वर्णन किया गया हैं। विशेष तथ्य यह है कि कुरुक्षेत्र की पौराणिक सीमा 48 कोस की मानी गई है जिसमें कुरुक्षेत्र के अतिरिक्त कैथल, करनाल, पानीपत और जिंद का क्षेत्र सम्मिलित हैं।

पौराणिक उल्लेख

कुरुक्षेत्र अम्बाला से 25 मील पूर्व में है। यह एक अति पुनीत स्थल है। इसका इतिहास पुरातन गाथाओं में समा-सा गया है। ऋग्वेद[1]में त्रसदस्यु के पुत्र कुरुश्रवण का उल्लेख हुआ है। 'कुरुश्रवण' का शाब्दिक अर्थ है 'कुरु की भूमि में सुना गया या प्रसिद्ध।' अथर्ववेद[2]में एक कौरव्य पति (सम्भवत: राजा) की चर्चा हुई है, जिसने अपनी पत्नी से बातचीत की है। ब्राह्मण-ग्रन्थों के काल में कुरुक्षेत्र अति प्रसिद्ध तीर्थ-स्थल कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण[3]में उल्लिखित एक गाथा से पता चलता है कि देवों ने कुरुक्षेत्र में एक यज्ञ किया था जिसमें उन्होंने दोनों अश्विनों को पहले यज्ञ-भाग से वंचित कर दिया था। मैत्रायणी संहिता[4]एवं तैत्तिरीय ब्राह्मण[5]का कथन है कि देवों ने कुरुक्षेत्र में सत्र का सम्पादन किया था। इन उक्तियों में अन्तर्हित भावना यह है कि ब्राह्मण-काल में वैदिक लोग यज्ञ-सम्पादन को अति महत्त्व देते थे, जैसा कि ऋग्वेद[6]में आया है-
'यज्ञेय यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यसन्।'

महाभारत एवं कुछ पुराणों में कुरुक्षेत्र की सीमाओं के विषय में एक कुछ अशुद्ध श्लोक आया है, यथा- तरन्तु एवं कारन्तुक तथा मचक्रुक (यक्ष की प्रतिमा) एवं रामह्रदों (परशुराम द्वारा बनाये गये तालाबों) के बीच की भूमि कुरुक्षेत्र, समन्तपञ्चक, एवं ब्रह्मा की उत्तरी वेदी है।[7] इसका फल यह है कि कुरुक्षेत्र कई नामों से व्यक्त हुआ है, यथा- ब्रह्मसर, रामह्रद, समन्तपञ्चक, विनशन, सन्निहती।[8]कुरुक्षेत्र की सीमा के लिए देखिए कनिंघम[9], जिन्होंने टिप्पणी की है कि कुरुक्षेत्र अम्बाला के दक्षिण 30 मीलों तक तथा पानीपत के उत्तर 40 मीलों तक विस्तृत है। प्राचीन काल में वैदिक लोगों की संस्कृति एवं कार्य-कलापों का केन्द्र कुरुक्षेत्र था। क्रमश: वैदिक लोग पूर्व एवं दक्षिण की ओर बढ़े और गंगा-यमुना के देश में फैल गये तथा आगे चलकर विदेह (या मिथिला) भारतीय संस्कृति का केन्द्र हो गया

महाभारत के युद्ध में अर्जुन को समझाते हुये श्रीकृष्ण

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ऋग्वेद 10.33.4
  2. अथर्ववेद 20.127.8
  3. शतपथ ब्राह्मण 4.1.5.13
  4. मैत्रायणी संहिता 2.1.4, 'देवा वै सत्रमासत्र कुरुक्षेत्रे
  5. तैत्तिरीय ब्राह्मण 5.1.1, 'देवा वै सत्रमासत तेषां कुरुक्षेत्रं वेदिरासीत्'
  6. ऋग्वेद, 10.90.16
  7. तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं रामह्रदानां च मचक्रुकस्य। एतत्कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं पितामहस्योत्तरवेदिरुच्यते॥ वनपर्व (83।208), शल्य पर्व (53।24)। पद्म पुराण (1।27।92) ने 'तरण्डकारण्डकयो:' पाठ दिया है (कल्पतरु, तीर्थ, पृ0 171)। वनपर्व (83।9-15 एवं 200) में आया हे कि भगवान् विष्णु द्वारा नियुक्त कुरुक्षेत्र के द्वारपालों में एक द्वारपाल था मचक्रक नामक यक्ष। क्या हम प्रथम शब्द को 'तरन्तुक' एवं 'अरन्तुक' में नहीं विभाजित कर सकते? नारदीय पुराण (उत्तर, 65।24) में कुरुक्षेत्र के अन्तर्गत 'रन्तुक' नामक उपतीर्थ का उल्लेख है (तीर्थप्र0, पृ0 464-465)। कनिंघम के मत से रत्नुक' थानेसर के पूर्व 4 मील की दूरी पर कुरुक्षेत्र के घेरे के उत्तर-पूर्व में स्थित रतन यक्ष है।
  8. तीर्थप्रकाश, पृ0 463
  9. आर्क्यालाजिकल सर्वे रिपोर्टस, जिल्द 14, पृ0 86-106
  10. तैत्तिरीय ब्राह्मण, 18.4.1
  11. ऐतरेय ब्राह्मण 8.1 या 2.19
  12. ऐतरेय ब्राह्मण, 35।4=7।30
  13. ऐतरेय ब्राह्मण, 38.3=8.14
  14. तैत्तिरीय आरण्यक, 5.1.1
  15. देवा वै सत्रमासत। ... तेषां कुरुक्षेत्रे वेदिरासीत्। तस्यै खाण्डवो दक्षिणार्ध आसीत्। तूर्ध्नमुत्तरार्ध:। परीणज्जधनार्ध:। मरव उत्कर:॥ तैत्तिरीय आरण्यक (तैत्तिरीय आरण्यक 5.1.1) क्या 'तूर्घ्न' 'स्त्रुघ्न' का प्राचीन रूप है? 'स्त्रुघ्न' या आधुनिक 'सुध' जो प्राचीन यमुना पर है, थानेश्वर से 40 मील एवं सहारनपुर से उत्तर-पश्चिम 10 मील पर है।
  16. अवश्वलायन, 12.6
  17. लाट्यायन, 10.15
  18. कात्यायन, 24.6.5
  19. छान्दोग्य उपनिषद, 1.10.1
  20. निरुक्त, 2.10
  21. ॠग्वेद, 10.98.5 एवं 7
  22. पाणिनि, 4.1.151 एवं 4.1.172
  23. दक्षिणेन सरस्वत्या दृषद्वत्युत्तरेण च। ये वसन्ति कुरुक्षेत्रे ते वसन्ति त्रिविष्टपे॥ वन पर्व (वन पर्व, 83.3, 204-205)।
  24. वामन पुराण, 86।6
  25. मनु, 2.17.18
  26. सरस्वतीदृषद्वत्योरन्तरं कुरुजांगलम्। वामन पुराण (22.47); सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम्। तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्त प्रचक्षते॥ कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पञ्चाला: शूरसेनका:॥ एष ब्रह्मर्षिदेशों वै ब्रह्मावर्तादनन्तर:॥ मनु (2.17 एवं 19)। युग-युग में देशों के विस्तार में अन्तर पड़ता रहा है। पंचाल दक्षिण एवं उत्तर में विभाजित था। बुद्ध-काल में पंचाल की राजधानी कन्नौज थी। शूरसेन देश की राजधानी थी मथुरा। 'अनन्तर' का अर्थ है 'थोड़ा कम' या 'किसी से न तो मध्यम या न भिन्न'। नारदीय पुराण <>उत्तर, 64।6<>।
  27. आद्यैषा ब्रह्मणो वेदिस्ततो रामहृदा: स्मृता:। कुरुणा च यत: कृष्टं कुरुक्षेत्रं तत: स्मृतम्॥ वामन पुराण (22.59-60)। वामन पुराण (22.18-20) के अनुसार ब्रह्मा की पाँच वेदियाँ ये हैं-
    1. समन्तपञ्चक (उत्तरा)
    2. प्रयाग (मध्यमा)
    3. गयाशिर (पूर्वा)
    4. विरजा (दक्षिणा) एवं
    5. पुष्कर (प्रतीची)।
    'स्यमन्तपंचक' शब्द भी आया है। (वामन पुराण 22.20 एवं पद्म पुराण 4.17.7) विष्णु पुराण (विष्णु पुराण, 4.19.74-77) के मत से कुरु की वंशावलीयों है- 'अजमीढ-ऋक्ष-संवरण-कुरु' एवं 'य इदं धर्मक्षेत्रं चकार'।
  28. यावदेतन्मया कृष्टं धर्मक्षेत्रं तदस्तु व:। स्नातानां च मृतानां च महापुण्यफलं त्विह॥ वामन पुराण (वामन पुराण, 22.33-34) मिलाइए शल्य पर्व महाभारत (शल्यपर्व, 53.13-14
  29. वायु पुराण, 7.93
  30. कूर्म पुराण, 2.20.33 एवं 37.36-37
  31. वन पर्व, 129.2
  32. वामन पुराण, 22.15-16
  33. वेदी प्रजापतेरेषा समन्तात्पञ्चयोजना। कुरोर्वै यज्ञशीलस्य क्षेत्रमेतन्महात्मन:॥ वनपर्व 9.129.22); समाजगाम च पुनर्ब्रह्मणो वेदिमुत्तराम्। समन्तपरंचकं नाम धर्मस्थानमनुत्तमम्॥ आ समन्ताद्योजनानि पञ्च पञ्च च सर्वत:॥ वामन पुराण (22.15-16)। नारद पुराण(उत्तर, 64.20)में आया है- 'पञ्चयोजनविस्तारं दयासत्यक्षमोद्गमम्। स्यमन्तपञ्चकं तावत्कुरुक्षेत्रमुदाहृतम्॥'
  34. वन पर्व, 83.1-2
  35. ततो गच्छेत राजेन्द्र कुरुक्षेत्रमभिष्टुतम्। पापेभ्यो विप्रमुच्यन्ते तद्गता: सर्वजन्तव:॥ कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम्। य एवं सततं ब्रूयात् सर्वपापै: प्रमुच्यते॥ वनपर्व (83.1-2)। टीकाकार नीलकण्ठ ने एक विचित्र व्युत्पत्तिदी है। (वनपर्व 83.6)- 'कुत्सितं रौतीतिकुरु पापं तस्य क्षेपणात् त्रायते इति कुरुक्षेत्रं पापनिवर्तकं ब्रह्मोपलब्धिस्थानत्वाद् ब्रह्मसदनम्।' 'सम्यक् अन्तोयेषु क्षत्रियाणां ते समन्ता रामकृतरुधिरोदह्रदा:, तेषां पञ्चकं समन्तपञ्चकम्।' देखिए तीर्थप्र0 (पृ0 463)।
  36. कुरुक्षेत्रसमा गंगा, वनपर्व 85.88
  37. नारदीय पुराण, 2.64.23-24
  38. ग्रहनक्षत्रताराणां कालेन पतनाद् भयम। कुरुक्षेत्रमृतानां तु न भूय: पतनं भवेत्॥ नारदीय पुराण (उत्तर, 2।64।23-24), वामन पुराण (33।16)।
  39. वनपर्व 83.11
  40. जो ऐतरेय ब्राह्मण का सम्भवत: परिसरक है
  41. उत्तर, अध्याय 65
  42. वनपर्व 83।85, वामन पुराण 49।38-41, नारदीय पुराण, उत्तर 65.95
  43. पृ0 334-335
  44. वामन पुराण, 25.50-55
  45. वामन पुराण 42.5, 57।89 एवं 89.3
  46. वनपर्व 84.96; नारदीय पुराण, उत्तरार्ध 65.83 एवं पद्म पुराण 1.26.90-91
  47. पद्म पुराण, आदि, 27।62
  48. आर्क्यालॉजिकल सर्वे रिपोर्टस आफ इण्डिया, जिल्द 2, पृ0 219
  49. वनपर्व, 83.142-149
  50. वनपर्व 83।147; शान्तिपर्व152.11; पद्म पुराण, आदि 27.33, 34, 36 एवं कल्प0 तीर्थ, पृ0 180-181, पुण्यमाहु नान्यत्तीर्थ कुरुद्वह॥ (वनपर्व 83.147)। वामन पुराण (22.44) का कथन है- 'तस्यैव मध्ये बहुपुण्ययुक्तं पृथूदकं पापहरं शिवं च। पुण्या नदी प्राङमुखतां प्रथाता जलौघयुक्तस्य सुता जलाढ्या॥'
  51. शल्यपर्व, 39.33-34
  52. अर्थात् वह जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है
  53. वामन पुराण, 39.20 एवं 23
  54. देखिए एपिग्रैफिया इण्डिका, जिल्द 1, पृ0 184
  55. वामन पुराण, 34.3
  56. उत्तर 65.4-7
  57. देखिए आर्क्यालाजिकल सर्वे रिपोर्टस फॉर इण्डिया, जिल्द 14, पृ0 90-91
  58. अध्याय 38
  59. पुष्कर में, जहाँ ब्रह्मा ने एक महान् यज्ञ करते समय उसका स्मरण किया था
  60. नैमिष वन में
  61. गया देश में गय द्वारा आवाहित की हुई
  62. उत्तर कोसल में औद्दालक के यज्ञ में
  63. ऋषभ द्वीप में कुरु के यज्ञ में
  64. कुरुक्षेत्र में वसिष्ठ द्वारा कही गयी
  65. जब ब्रह्मा ने हिमालय में पुन: यज्ञ किया
  66. वामन पुराण, 34.68
  67. यद्यपि 9 के नाम आधे हैं
  68. देखिए तीर्थों की सूची
  69. वामन पुराण, 32.3-4
  70. सचौ, जिल्द 1, पृ0 261
  71. बम्बई गजेटियर, जिल्द 5, पृ0 283, कुरुक्षेत्र के तीर्थों की सूची के लिए देखिए, ए.एस. आर. ऑफ इण्डिया (जिल्द 14, पृ0 17-106)।
  72. महाभारत, शल्यपर्व, अध्याय 53

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